सिद्धांत रहस्यम् – षोडस ग्रंथ
श्री वल्लभाचार्य जी महाप्रभुजी रचित षोडस ग्रंथ मे से एक सिद्धांत रहस्यम् ग्रंथ |
सिद्धांत रहस्यम्
श्रावण श्यामले पक्षे एकादश्यां महानिशि ।
साक्षात भगवता प्रोक्तं तदक्षरश: उच्यते ॥१॥
अर्थ: श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की महानिशा (महान रात्रि) में साक्षात् भगवान् ने जो कहा था, वही मैं अक्षरशः कहूँगा।
ब्रमसम्बंध करणात्, सर्वेषां देह जीवयोः ।
सर्व दोषनिवृत्तिर्हि, दोषाः पंचविधा: स्मृताः ॥२॥
अर्थ: ब्रह्मसम्बन्ध होने से देह और जीव के समस्त दोषों की निवृत्ति होती है—यह निश्चित है। दोष पाँच प्रकार के कहे गए हैं।
सहजा देश कालोत्था, लोकवेद निरूपिताः ।
संयोगजाः सपर्शजाश्च न मन्तव्याः कथन्चन ॥३॥
अर्थ: सहज दोष, देश और काल से उत्पन्न दोष, लोक तथा वेद में निरूपित दोष, संयोग से उत्पन्न दोष तथा स्पर्श से उत्पन्न दोष—इन पाँचों दोषों का उसके बाद कोई विचार नहीं करना चाहिए। भक्तिमार्ग में आने के पश्चात् इन दोषों को किसी भी प्रकार नहीं मानना चाहिए।
अन्यथा सर्व दोषाणां न निवृत्ति: कथंचन ।
असमर्पित वस्तुनां तस्माद्वर्जनमाचरेत् ॥४॥
अर्थ: ब्रह्मसम्बन्ध के बिना किसी अन्य उपाय से समस्त दोषों की किसी भी प्रकार निवृत्ति नहीं होती। इसलिए असमर्पित वस्तुओं का, अर्थात् जिन वस्तुओं का प्रभु को समर्पण नहीं किया गया हो, उनका त्याग करना चाहिए।
निवेदिभिः समर्यैव, सर्व कुर्यादिति स्थितिः ।
न मतं देवे देवस्य, सामिभुक्त समर्पणम् ॥५॥
अर्थ: जिन भक्तों ने अपनी आत्मा का भगवान् को निवेदन किया है, उन्हें प्रत्येक पदार्थ भगवान् को अर्पित करके ही उसी के द्वारा अपना निर्वाह करना चाहिए। यही भक्तिमार्ग की स्थिति (मर्यादा) है। देवों के देव भगवान् श्रीकृष्ण को अर्ध-भोग की हुई वस्तु अर्पित नहीं करनी चाहिए।
तस्मादादौ सर्वकार्ये सर्ववस्तु समर्पणम् ।
अर्थ: इसलिए प्रत्येक कार्य के आरम्भ में ही प्रत्येक वस्तु का प्रभु को समर्पण करना चाहिए।
दत्तापहार वचनं तथा च सकलं हरे : ॥६॥
न ग्राह्ममिति वाक्यं हि, भिन्न मार्ग परंमतम् ।
अर्थ: शास्त्र में कहा गया है कि जो दिया गया है (दान किया गया है), उसे पुनः ग्रहण नहीं करना चाहिए। उसी प्रकार “हरि की वस्तु का ग्रहण नहीं किया जा सकता”—इस प्रकार के वचन को ग्रहण नहीं करना चाहिए; क्योंकि दान के सम्बन्ध में यह वचन भिन्न मार्ग का अनुसरण करने वालों के लिए माना गया है, भक्तिमार्ग के लिए नहीं।
सेवकानां यथालोके, व्यवहारः प्रसिध्यति ॥७॥
तथा कार्य समप्यैॅव, सर्वेषां ब्रह्मता ततः ।
अर्थ: जिस प्रकार लोक में सेवक का व्यवहार मान्य माना जाता है, उसी प्रकार प्रभु को अर्पण करके सभी कार्य करने चाहिए, जिससे सभी कार्यों को भी ब्रह्मता प्राप्त होती है।
गंगात्वं सर्व दोषाणां, गुण दोषादि वर्णना ॥८॥
गंगात्वेन निरूप्या स्यात् – तद्दवत्रापि चैव हि ॥८ १/२॥
अर्थ: गङ्गाजी में मिलने वाले अशुद्ध जल आदि के दोष गङ्गाजी के स्वरूप में ही परिवर्तित हो जाते हैं, और जल के गुण-दोष का वर्णन भी गङ्गाजी के स्वरूप से ही किया जाता है। उसी प्रकार ब्रह्मसम्बन्ध होने पर जीव के गुण-दोषों का वर्णन नहीं रहता, बल्कि उसकी ब्रह्मता अर्थात् निर्दोषता तथा समत्व सिद्ध हो जाता है।
॥ इति श्रीमद् वल्लभाचार्य विरचितं सिद्धान्तरहस्यं सम्पूर्णम् ॥
