मंगलाचरणम्
छंद : अनुष्टुप
चिन्तासन्तानहन्तारो, यत्पादांबुजरेणवः।
स्वीयानां तान्निजाचार्यान, प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥१॥
अर्थ: जिनके चरणकमलों की रज ही अपने सेवकों की समस्त चिंताओं का नाश कर देती है, ऐसे मेरे आचार्य श्रीमहाप्रभुजी को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ। ॥१॥
यदनुग्रहतो जन्तुः, सर्व दुःखातिगो भवेत ।
तमहं सर्वदा वंदे, श्रीमद वल्लभनन्दनम ॥२॥
अर्थ: जिनकी कृपा मात्र से जीव समस्त दुःखों को दूर करने में समर्थ हो जाता है, ऐसे श्रीमद् वल्लभनन्दन को मैं सर्वदा वन्दन करता हूँ। ॥२॥
अज्ञानतिमिरान्धस्य, ज्ञानांजनशलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन, तस्मै श्रीगुरुवै नमः ॥३॥
अर्थ: अज्ञानरूपी अन्धकार से बन्द हो चुके हमारे नेत्रों को जिन्होंने ज्ञानरूपी शलाका से खोल दिये, ऐसे श्रीगुरुदेव को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥३॥
नमामि हृदये शेषे, लीलाक्षीराब्धिशायिनम।
लक्ष्मीसहस्त्रलीलाभिः, सेव्यमानं कलानिधिम ॥४॥
अर्थ: अब मंगलाचरण के अगले दो श्लोक, अर्थात् चौथा और पाँचवाँ श्लोक, श्रीमहाप्रभुजी द्वारा विरचित श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध पर लिखित सुबोधिनीजी टीका के मंगलाचरण से लिए गए हैं। इस श्लोक में श्रीमहाप्रभुजी कहते हैं कि शेषरूप मेरे हृदय में लीलारूपी क्षीरसागर में शयन करने वाले, सहस्रों लक्ष्मियों तथा उनकी लीलाओं से सेवित, कलानिधि पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥४॥
चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च त्रिभिस्तथा ।
षडभिर्विराजते योसौ, पंचधा हृदये मम ॥५॥
अर्थ: चार, चार, चार, तीन तथा छह—इन पाँच प्रकारों से जो मेरे हृदय में विराजमान हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। इस कारिका में श्रीमहाप्रभुजी दशम स्कन्ध के प्रकरणों के अर्थरूप भगवान् को नमस्कार करते हैं। श्रीमहाप्रभुजी ने दशम स्कन्ध के पाँच प्रकरण किए हैं—
(१) जन्मप्रकरण, जिसके चार अध्याय हैं;
(२) तामसप्रकरण, जिसके चार अवान्तर प्रकरण हैं;
(३) राजसप्रकरण, जिसके चार अवान्तर प्रकरण हैं;
(४) सात्त्विक प्रकरण, जिसके तीन अवान्तर प्रकरण हैं; तथा
(५) गुणप्रकरण, जिसके छह अध्याय हैं।
श्रीमहाप्रभुजी कहते हैं कि इन पाँचों प्रकरणों में विराजमान श्रीकृष्ण पाँच प्रकार से मेरे हृदय में विराजते हैं; उन श्रीकृष्ण को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥५॥
॥इति श्री मंगलाचरण संपूर्णम ॥
