गोवर्धन पूजा – अन्नकूट
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तिथि : कार्तिक शुक्लपक्ष एकम
गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट यह पुष्टिमार्ग के अत्यंत महत्व पूर्ण उत्सवों मे से एक है | यह उत्सव अपने साथ कई एतिहासिक प्रसंग और प्रभु की लीलाओ के दर्शन कराता है | गोवर्धन पूजा मे प्रभु ने इन दिवाली के दिनों मे गायों के पूजन का महत्व बताया | स्वयं गायों का पूजन किया |
अब आज के उत्सव के दिवस प्रभु ने अपने भक्त की महिमा स्थापी है | समग्र संसार मे दो इसे स्वरूप है जो भक्त भी है और भगवान भी है | यह दोनों स्वरूप भक्तों मे सर्वोत्तम है | मर्यादा मे श्री हनुमानजी और पुष्टि मे श्री गिरीराजजी | गिरीराजजी हरीदास वर्य है | माने हरी के दसों मे श्रेष्ठ |
श्री कृष्ण लीला

गोवर्धन पूजा :
सभी व्रजवासी हर वर्ष इंद्रदेव की पूजा किया करते | जब प्रभु श्री कृष्ण को ज्ञात हुआ की इंद्रदेव को अहंकार हुआ है | तब उनके अहंकार का मर्दन करने हेतु प्रभु ने सभी व्रजवासी से इन्द्र देव की पूजा ना करने की सलाह दी | और गायों एवं गोवर्धन पर्वत की पूजा करने को कहा | गर्गाचार्यजी भी प्रभु की वाणी से सहमत हुए |
सभी व्रजवासी ने उत्साह पूर्वक सामग्री सिद्ध की |
फिर प्रभु श्री कृष्ण सभी को लेकर गिरीराजजी के पास आए | फिर शास्त्रोक्त विधि से गिरीराजजी का अभिषेक एवं पूजन किया |

अन्नकूट :
फिर सभी व्रजवासी ने भोग धराया | भोग मे भात भात की सामग्री विशेष मात्रा मे धराई गई | जो अन्नकूट के रूप मे जानी जाती है |

फिर प्रभु स्वयं गिरीराजजी मे समाहित हुए और कहा “मे ही गोवर्धन हु |” फिर शहस्त्र हस्त प्रकट किए | एक भाव एसा भी है की सभी सखा एवं सखियो का मनोरथ था की प्रभु को भोग आरोगाए | इस कारण से प्रभु ने आधे श्री हस्त सखाओ के भाव से एवं आधे श्री हस्त सखियों के भाव से प्रकट किए और प्रेम से एक – एक धरी गई सामग्री को प्रभु ने आरोगा है |
तब से प्रारंभ हुई यह परंपरा आज भी व्रज भूमि समान रूप से उत्साह से निभाई जाती है | पुष्टिमार्ग मे भी यह परंपरा एवं यह क्रम का विशेष महत्व देखने को मिलता है | सभी पुष्टिमार्ग मंदिरों मे यह उत्सव बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है | प्रभु श्रीनाथजी को अन्नकूट धराया जाता है |
श्रीनाथजी दर्शन
धन तेरस से देव प्रबोधिनी एकादशी के सभी उत्सव के पद, (गोवर्धन लीला के पद, इंद्रमान भंग के पद,अन्नकूट के पद, गोवर्धन पूजन के पद, भाई दूज के पद, गोपाष्टमी के पद, देव प्रबोधिनी एकादशी के पद) नीचे उपलब्ध ई-बुक मे प्राप्य है |
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