चतुःश्लोकी – षोडस ग्रंथ
श्री वल्लभाचार्य जी महाप्रभुजी रचित षोडस ग्रंथ मे से एक चतुःश्लोकी ग्रंथ हिन्दी भावार्थ सह |
|| चतुःश्लोकी ||
सर्वदा सर्व भावेन, भजनीयो व्रजाधिपः ।
स्वस्यायमेव धर्मोहि, नान्यः कवापि कदाचन ॥१॥
अर्थ: निरन्तर सर्वात्मभाव से व्रजपति श्रीकृष्ण की सेवा करनी चाहिए। भक्त का यही धर्म है, यह निश्चित है। किसी भी स्थान में, किसी भी काल में, सेवा के सिवा दूसरा कोई धर्म नहीं है। ॥१॥
एवं सदा स्म कर्तव्यं , स्वयमेव करिष्यति ।
प्रभुः सवॅ समर्थो हि, ततो निश्चिन्ततां व्रजेत ॥२॥
अर्थ: निरन्तर इसी प्रकार करना चाहिए। भक्तों के स्वामी भगवान् भक्त के सर्व अर्थरूप हैं; इसलिए भक्त के सभी कार्य भगवान् ही निश्चित रूप से करेंगे। यह बात प्रसिद्ध है। भक्त को चिंता रहित रहना चाहिए। ॥२॥
यदि श्री गोकुलाधीशो, धृतः सर्वात्मना हृदि ।
ततः किमपरं ब्रूहि, लोकिकै र्वैदिकैरपि ॥३॥
अर्थ: यदि श्रीगोकुल के अधिपति श्रीकृष्णचन्द्र को हृदय में सभी प्रकार से धारण किया हो, तो फिर लौकिक सुख और वैदिक कर्मजन्य स्वर्गादि सुख में क्या अधिकता है? अर्थात् लौकिक-वेदिक सुख से क्या प्रयोजन है? यदि है, तो तुम कहो। ॥३॥
अतः सर्वात्मना शश्वद्, गोकुलेश्वर पादयोः ।
स्मरणं भजनं चापि, न त्याज्यामिति मे मतिः ॥४॥
अर्थ: इसलिए सर्वात्मभाव से निरन्तर श्रीगोकुलेश के चरणकमलों का स्मरण और सेवाको नहीं त्यागना चाहिए, एसी ही मेरी मति होनी चाहिए । ॥४॥
॥इति श्री वल्लभाचार्यविरचितं चतुःश्लोकी सम्पूर्णम ॥
