होली डंडा रोपण
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तिथि : माघ शुक्लपक्ष पूनम
श्री कृष्ण व्रजलीला :
व्रज मे होली के एक मास पूर्व आज पूर्णिमा को होरिडांडा रोपण उत्सव मनाया जाता है। व्रज रीति के अनुसार श्रीमद् गोकुल के चोहटा पर नंदबाबा पूरे परिकर के साथ कीर्तन करते हुए आते हैं | उत्सव मनाते हैं | लोग खूब नाचते-गाते हैं होरी डांडा रोपण करते हैं।
इसमे रहा भाव यह है की इन ४० दिनों मे होने वाले होली खेल निर्विघ्न हो | उस कारण से ब्रामहण से मंत्रोच्चार द्वारा विधि विधान से वेद-ध्वनि के साथ डंडा लाल ध्वजाजी के साथ रोपा जाता है | आनंद उत्सव होता है और धमार पद का गायन आज से शुरू होता है |
डांडा के ऊपर लाल रंग की ध्वजा फहरायी जाती है | जो कि हार-जीत की प्रतीक है अर्थात योगी प्रभु श्रीकृष्ण को अपने वश में करने आये कामदेव की चुनौती प्रभु ने स्वीकार कर ली है |
नंदरायजी, वृषभानजी, बड़े गोप, यशोदाजी, गोपी-ग्वाल, गोपाल, बलदेव आदि सभी दंडवत प्रणाम कर धमार का प्रारंभ करते हैं |

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सेवा मे बदलाव :
आज से धमार का आरंभ होगा | आज से प्रतिदिन राजभोग दर्शन में प्रभु के मुखारविंद (कपोल) पर गुलाल लगायी जाती है | प्रभु को गुलाल और अबीर की फेंट (पोटली) भरी जाती है | पुष्प की छड़ी एवं गुलाल पिचकारी धरी जाती है | गुलाल-अबीर का खेल भारी होता जाता है | होली की गालियाँ भी गायीं जाती है |
झांझ, मृदंग, ढप बांसुरी आदि वाध्य बजाये जाते हैं.
आज का उत्सव श्री यमुनाजी की सेवा के दस दिन की पूर्णता है | माघ कृष्ण प्रतिपदा से दस दिन धमार के दिन कहे जाते हैं और ये श्री चन्द्रावलीजी की सेवा के दिवस हैं | श्रीजी में बसंत पंचमी से केवल वसंत राग के पद गाये जाते हैं जबकि होली-डांडा रोपण के पश्चात धमार का प्रारंभ हो जायेगा अर्थात आज से अन्य राग के पद भी गाये जा सकेंगे |
आज से एक मास तक श्रीजी को कुल्हे का श्रृंगार नहीं धराया जाता | क्योंकि कुल्हे का श्रृंगार बाल-भाव का श्रृंगार माना जाता है | और होली-खेल की लीला किशोर-भावना की है अतः सेहरा, मुकुट, टिपारा आदि के श्रृंगार धराये जाते हैं |
श्रीनाथजी दर्शन – होली डंडा रोपण
वसंत पंचमी के पद, होरी डंडा रोपण के पद, कुंज एकादशी के पद, गुसाइजी की अष्टपदी, डोल के पद, होली खेल के 40 दिवस दरमियान नित्य सेवा के पद नीचे दी गई ई-बुक मे है |
जो हमारे पध्य साहित्य शेकशन मे उपलब्ध है |


