श्री गुसाइजी प्राक्टयोत्सव – जलेबी उत्सव

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तिथि : मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष नवमी

गुसाइजी प्राक्टयोत्सव - जलेबी उत्सव

समग्र पुष्टि श्रुष्टी के लिए आज का उत्सव अती विशेष उत्सव है | आज श्री वल्लभाचार्यजी के द्वितीय लालन – श्री विठ्ठलनाथजी प्रभुचरण का प्राकट्य हुआ है | श्री महाप्रभुजी ने पुष्टिमार्ग के चित्र की रचना की और श्री गुसाइजी ने उस चित्र मे रंग भरे |

श्रीनाथजी की सेवा क्रम का अद्वितीय विस्तार, प्रभु सुखार्थ ऋतु एवं उत्सव अनुसार राग – भोग – शृंगार की सेवा प्रणालिका का स्थापन किया | गुसाइजी ने कई जीवों को अपने शरण मे लिया है |

आपश्री के महान जीवन चरित्र के दर्शन एवं पुष्टिमार्ग मे योगदान को आप नीचे दी गई ई-बुक पढ़ शकते है |

PushtiMarg Aacharyas

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Badhai – Palna k Pad kirtan

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जलेबी उत्सव क्या है ? : 

गुसाइजी प्राक्टयोत्सव जलेबी उत्सव

एक समय की बात है पोष कृष्ण अष्टमी जिसे बड़ी आठम भी कहा जाता है | श्री गुसाईंजी प्रभु चरण गोकुल मे बिराज रहे थे | श्री गिरिराज जी पर श्री रामदास जी श्रीजी की श्रींगार सेवा कर रहे थे और श्री कुंभनदासजी कीर्तन गा रहे थे।

तब हमारे लाडले श्रीजी बावा ने दोनों को संबोधित करते हुए आज्ञा की “रामदास जी, कुंभनदासजी आप जानते हो कि काकाजी (श्रीजी श्री गुसाईंजी को काका जी नाम से पुकारते) मेरो प्राकट्य उत्सव कितनी धूम धाम से मनाते हैं और कल काकाजी को जन्मदिन है वा को उत्सव हर्ष एवं उल्लास मनाना चाहते हैं सो कोई सुन्दर सी सामग्री सिद्ध करी के हमकु धराव

तब रामदास जी और कुंभनदासजी ने पूछा ” कौनसी सामग्री आरोगो गे? ” तब श्रीजी ने आज्ञा की ” हमकु काकाजी के स्वरूप अनुसार रस रूप जलेबी धरो” तब दोनों ने कहा” जो आज्ञा ” फिर सभी वैष्णवन को एकत्रित करी के श्रीजी के मनोरथ (इच्छा) से अवगत कराया |

तब वहा पर उपस्थित श्री सदुपांडे ने कहा कि सामग्री सिद्ध करने के लिए जो सामग्री मेंदा इत्यादि हम पथरावेंगे । कुंभनदासजी ने अपने दो पाडे एवं दो पाड़ी बैच कर 5 रूपए रामदास जी को सामग्री के लिए दिए |

रामदास जी ने उस पैसों से खांड (चीनी) पधाराई | फिर सभी वैष्णवन ने मिलकर रात को गिरिराज जी पर पूरी रात मिलके टोकरियां भर भर के जलेबी की सामग्री सिद्ध की | फिर सवेरे श्रीजी की सेवा में जलेबी की सामग्री धराई |

तब वहा पे श्री गुसाईंजी गोवर्धन पधारे और राजभोग मे श्रीजी की सेवा में इतनी सारी जलेबी देख कर रामदास जी को पूछा कि “आज इतनी सारी जलेबी धरने का कोई विशेष कारण?” तब राम दास जी ने श्री गुसाईंजी को प्राकट्य उत्सव की बधाई दी और श्रीजी के मनोरथ के बारे में जानकारी दी |

तब सब वैष्णवन ने आपश्री को खूब खूब मंगल बधाई दी । श्री गुसाईंजी और श्रीजी बावा खूब प्रसन्न भये । तब से श्री गुसाईंजी के प्राकट्य उत्सव को हर साल “जलेबी उत्सव” के रूप में मनाया जाता है ।

श्रीनाथजी दर्शन 

गुसाइजी प्राक्टयोत्सव जलेबी उत्सव

सभी द्वार में डेली मढ़े,बंदरवाल बंधे।पुरे दिन जमना जल की झारीजी आवे। थाली की आरती आवे। अभ्यंग होवे।महाप्रभुजी के अभ्यंग,श्रृंगार होवे।निजमंदिर को सब साज जडाऊ आवे।तकिया जडाऊ।गाडी,खंड आदि पे मखमल को साज आवे।गेंद,चौगान,दिवला सोना के।राजभोग में बीड़ा सिकोरी में आवे।

वस्त्र:- चागदार बागा,चोली,सुथन सब केसरी साटन,अड़तू के,बिना किनारी के।पटका केसरी किनारी के फूल को।कूल्हे केसरी।मोजाजी टकमा हीरा के।ठाड़े वस्त्र मेघस्याम। पिछवाई जन्माष्टमी वाली।

आभरण:- सब उत्सव के।तीन जोड़ी को श्रृंगार,बनमाला को त्रवल,टोडर दोनों आवे।दो हालरा,बघनखा धरावे।कली, कस्तूरी आदी सब आवे।चोटीजी हीरा की।कंदरा जी पे प्राचीन जडाऊ चौखटा आवे।वेणु वेत्र हीरा के।पट उत्सव को,गोटी जडाऊ।श्रीमस्तक पे पाच मोर चन्द्रिका को जोड़ आवे।आरसी जडाऊ व सोना के डाँड़ी की।

आज मंगला से जलेबी अरोगे।श्रृंगार में पण्ड्याजी वर्ष बाचे।उत्सव भोग में जलेबी के टोकरा,दूध घर को दोहरा साज,व हांडी,श्रीखंडबड़ी को डबरा,केसर युक्त पेठा व मीठी सेव,पाच भात,शीतल,बादाम की बर्फी तले हुवे सूखे मेवे आदि आवे ।महाप्रभुजी के सब अनंसकड़ी भोग आवे।

राजभोग समय उस्ताजी की बड़ी आरसी देखे,सब स्वरूप के तिलक होवे फिर मुठिया वार के आरती होवे।

मंगला – अचल बधायो है 

अभ्यंग – आपुन मंगल गावो, चिरजियो यह लाल, मंगल गावो माई, उच्छव हो बड़ कीजे 

श्रृंगार – आनंद आज नंदजु के 

राजभोग – (तिलक) बधाई को दिन नीको आज 

आरती – धर्म हीते पायो यह धन 

शयन – सुभग सहेली

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