गोपाष्टमी
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गोपाष्टमी तिथि : कार्तिक शुक्लपक्ष अष्टमी
” नंदके लाल चले गौचारन शोभा कहत न आवे ॥ “



“आगे गाय पाछे गाय , इत गाय उत गाय
गोविंद को गायन मे बसवो ही भावे “
श्री कृष्ण लीला कथा
यह उत्सव पूर्ण रूप से प्रभु की व्रजलीला का उत्सव है |
जब हमारे कन्हैया पांच वर्ष के हुए, तब उन्होंने गायें चराने की जिद की | परंतु उनकी माता ने मना कर दिया। फिर भी वे नहीं माने। उनकी जिद के चलते उनका मुंडन संस्कार अक्षय तृतीया को हुआ | (आप वह प्रसंग हमारे उत्सव शेकशन मे अक्षय तृतीया उत्सव मे जान शकते है ) |
प्रभु की हठ के चलते यशोदा मैया थक गई और गायों के चरणे की अनुमति दे दी | फिर अन्नकूट के दिन गाय के गोचारण के शूकन किए | कन्हैया संतुष्ट नहीं हुए | गोपगण अष्टांग योग से गायों की सेवा करते थे | इस कारण से कार्तिक सुद अष्टमी के दिन गाय चराने की जिद की | जिसे “गोपाष्टमी” के रूप में जाना जाता है।
प्रभु ने अपनी माता से कहा, “माँ, मैं अब बड़ा हो गया हूँ, मुझे डर नहीं लगता और मेरे सभी मित्र और बलराम भी मेरे साथ हैं, इसलिए चिंता मत करो।” फिर माता मान गईं | और श्री कृष्ण के मुकुट काछनी के शृंगार किए । नजर न लगे इसलिए काला टीका लगाया। फिर आरती लेकर आईं। कन्हैया के पहले गोचरण के लिए आरती की।
फिर उन्हें शिक्षा दी। जंगल या जलाशय में न जाएं, मित्रों के साथ झगड़ा न करें, समय पर भोजन कर लें। फिर माता ने बलराम और श्रीदामा को भी कन्हैया का ध्यान रखने को कहा। उन्हें अकेला न छोड़ें, नहीं तो वे अपना रास्ता खो देंगे और जंगल में खो जाएंगे। समय-समय पर उन्हें भोजन कराएं।
प्रथम गोचारण चले गोपाल
श्रीनाथजी गायों को चराने के लिए वेणु बजाते हुए ग्वालों के साथ आ रहे हैं। समस्त चराचर श्री कृष्ण के वेणु की धुन से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, ग्वाल मंडली पवित्र लीला जैसे नृत्य, गीतों में मग्न हैं। गोपाल के सुशोभित शृंगार रस स्वरूप के दर्शन करके सभी गोपियाँ मन हार गई हैं।
प्रकृति में अलग ही सौंदर्य का निखार आया है। लताए खिल उठी है | पक्षी कलरव कर रहे हैं। नंदलाल अपनी लीला में मगन लटकती चाल से चल रहे हैं।
पुष्टिमार्ग मे गोपाष्टमी
श्री कृष्ण को आज ‘गोप’ का दरजा मिला था | इस कारण से गोपाष्टमी के रूप मे मनाया जाता है | व्रज में प्रभु श्रीकृष्ण की समस्त जीवन क्रिया गौ-चारण में ही हुई | तभी प्रभु को गोपाल कृष्ण भी कहा जाता है |
श्री महाप्रभुजी ने भी गौ सेवा के प्रति पूर्ण समर्पित थे | आपश्री के बाल्यकाल मे आपकी एक प्रिय गाय थी | जब आप बाहर थे तब गाय ने देह त्याग किए थे | पर आपश्री ने आते ही मधुर स्वर से पुकारा तो गाय मे प्राण आ गए | श्रीनाथजी ने जब महाप्रभुजी से गाय मांगी थी तब आपश्री ने आपकी अंगूठी बेच कर प्रभु के लिए गाय पधराई |
प्रभु गाय के बिना एक क्षण भी नहीं रह शकते | इसी कारण से व्रज मे जब महाप्रभुजी ने श्रीजी को मंदिर मे पाट पधराए | तब महाप्रभुजी से गाय मांगी | महाप्रभुजी के साथ साथ सभी व्रजवासी ने गाय पधराई और देखते ही देखते विशाल संख्या मे गाय आ गई | गौशाला बनी | गाव का नाम गोपालपुरा हुआ (अभी का जतीपुरा) |
नाथद्वारा मे भी प्रभु की बड़ी गौशाला है | आज के दिन उत्थापन उपरांत गौशाला में पाडों (भैंसों) की भिड़ंत करायी जाती है | जिसमें हजारों की संख्या में नगरवासी गौशाला में एकत्र हो कर पाडों (भैंसों) की भिड़ंत का आनंद लेते हैं | आज की भिड़ंत के लिए ग्वालबाल कई माह पूर्व से पाडों (भैंसों) को अच्छी खुराक खिला कर तैयार करते हैं |
आज सभी पुष्टिमार्गीय वैष्णव विशेष रूप से गौशाला जाते है | गायों का चारा, घास, लड्डू इत्यादि खिलाते है |
आज श्रीजी के अलावा सभी पुष्टिमार्ग के मंदिरों मे कुंडवरा का मनोरथ होता है |
श्रीनाथजी दर्शन – गोपष्टमी
धन तेरस से देव प्रबोधिनी एकादशी के सभी उत्सव के पद, (धन तेरस के पद, रूप चतुर्दशी के पद, दीपावली के पद, दीपमालिका के पद, हटरी के पद, कान जगाई के पद, अन्नकूट के पद, गोवर्धन पूजन के पद, भाई दूज के पद, गोपाष्टमी के पद, देव प्रबोधिनी एकादशी के पद) नीचे उपलब्ध ई-बुक मे प्राप्य है |
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