सर्वोत्तम स्तोत्र
प्राकृत धर्मानाश्रय-मप्राकृत निखिल धर्म रूपमिति ।
निगम प्रतिपाद्यमं यत्-तच्छुद्वं साकृति सतौमि ॥१॥
कलिकाल तमश्छन्न- दृष्टित्वा द्विदुषामपि ।
संप्रत्य विषयस्तस्य, माहात्म्यं समभूदभुवि. ॥२॥
दयया निज माहात्म्यं, करिष्यन्प्रकटं हरिः ।
वाण्या यदा तदा स्वास्यं, प्रादुर्भूतं चकार हि ॥३॥
तदुक्तमपि दुर्बोधं, सुबोधं स्याद्यथा तथा ।
तन्नामाष्टोरतरशतं, प्रवक्ष्याम्यखिलाघहृत. ॥४॥
ऋषिरग्नि कुमारस्तु, नाम्नां छन्दो जगत्यसौ ।
श्री कृष्णास्यं देवता च, बीजं कारुणिकः प्रभुः ॥५॥
विनियोगो भक्तियोग:, प्रतिबंध विनाशने ।
कृष्णाधरामृता स्वाद- सिद्धिरत्र न संशयः ॥६॥
आनंदः परमानंदः, श्रीकृष्णास्यं कृपानिधिः ।
दैवोद्धार प्रयत्नात्मा, स्मृतिमात्रार्तिनाशनः. ॥७॥
श्री भागवत गूढार्थ- प्रकाशन परायणः ।
साकार ब्रह्मवादैक, स्थापको वेदपारगः ॥८॥
मायावाद निराकर्ता, सर्ववादि निरासकृत ।
भक्तिमार्गाब्जमार्तण्डः, स्त्रीशूद्राद्युदधृतिक्षमः ॥ ९॥
अंगीकृतयैव गोपीश, वल्लभीकृतमानवः ।
अंगीकृतौ समर्यादो, महाकारुणिको विभुः. ॥१०॥
अदेयदानदक्षश्च, महोदारचरित्रवान ।
प्राकृतानुकृतिव्याज – मोहितासुर मानुषः ॥११॥
वैश्वानरो वल्लभाख्यः, सद्रूपो हितकृत्सताम
जनशिक्षाकृते कृष्ण, भक्तिकृन्नि खिलेष्टदः ॥१२॥
सर्वलक्षण सम्पन्नः, श्रीकृष्णज्ञानदो गुरुः ।
स्वानन्दतुन्दिलः पद्म – दलायतविलोचनः ॥१३॥
कृपादृग्वृष्टिसंहृष्ट, दासदासी प्रियः पतिः ।
रोषदृक्पात संप्लुष्ट – भक्तद्विट भक्त सेवितः ॥१४॥
सुखसेव्यो दुराराध्यो, दुर्लभांध्रिसरोरुहः ।
उग्रप्रतापो वाक्सीधु, पूरिता शेषसेवकः ॥१५॥
श्री भागवत पीयूष – समुद्र मथनक्षमः ।
तत्सारभूत रासस्त्री भाव पूरित विग्रहः ॥१६॥
सान्निध्यम्मात्रदत्त श्री कृष्णप्रेमा विमुक्तिदः ।
रासलीलैकतात्पर्यः, कृपयैतत्कथाप्रदः ॥१७॥
विरहानुभवैकार्थ, सर्वत्यागोपदेशकः ।
भक्त्याचारोपदेष्टा च, कर्ममार्गप्रवर्तकः ॥१८॥
यागादौ भक्तिमार्गैक – साधनत्वोपदेशकः ।
पूर्णानन्दः पूर्ण कामो , वाक्पतिर्विबुधेश्वरः ॥१९॥
कृष्णनामसहस्त्रस्य – वक्ता भक्तपरायणः ।
भक्त्याचारोपदेशार्थ – नानावाक्य निरूपकः ॥२०||
स्वार्थो जीजताखिल प्राण – प्रियस्ताद्रशवेष्टितः ।
स्व दासार्थ कृताशेष-साधनः सर्व शक्तिधृक ॥२१॥
भुवि भक्ति प्रचारैक-कृते स्वान्वयकृत पिता |
स्ववंशे स्थापिताशेष-स्वमहात्म्यः स्मयापहः ॥२२॥
पतिव्रतापतिः पार-लौकिकैहिक दानकृत ।
निगूढहृदयो नन्य – भक्तेषु ज्ञापिताशयः. ॥२३॥
उपासनादिमार्गाति, मुग्ध मोह निवारकः ।
भक्तिमार्गे सर्वमार्ग, वैलक्षण्यानुभूतिकृत ॥२४॥
पृथक्शरण मार्गोप – देष्टा श्री कृष्णहार्दवित ।
प्रतिक्षण निकुंजस्थ, लीला रस सुपूरितः ॥२५॥
तत्कथाक्षिप्तचितस्तद् – विस्मृत|न्यो व्रजप्रियः ।
प्रिय व्रज स्थितिः पुष्टिलीलाकर्ता रहः प्रियः ॥२६॥
भक्तेच्छा पूरकः सर्वा, ज्ञातलीलोतिमोहनः ।
सर्वासक्तो भक्तमात्रा-सक्तः पतितपावनः ॥ २७॥
स्वयशोगानसंहऋष्ठं , ऋदयाम्भोजविष्टरः ।
यशः पीयूष्लहरी, प्लावितान्यरसः परः. ॥२८॥
लीलामृतरसार्द्रार्द्री, कृताखिलशरीरभृत ।
गोवर्धनस्थित्युत्साह:, तल्लीला प्रेमपूरितः ॥२९॥
यज्ञभोक्ता यज्ञकर्ता, चतुर्वर्ग विशारदः ।
सत्य प्रतिज्ञ स्त्रिगुणा-तीतो नयविशारदः. ॥३०॥
स्वकीर्तिवर्द्धनस्तत्व-सूत्रभाष्यप्रदर्शकः ।
माया वादाख्य तूलाग्नि-र्ब्रह्मवादनिरूपकः. ॥३१॥
अप्राकृताखिलाकल्प-भूषितः सहजस्मितः ।
त्रिलोकीभूषणं भूमि-भाग्यं सहज सुन्दरः ॥३२॥
अशेष भक्त संप्रार्थ्य, चरणाब्ज रजोधनः ।
इत्यानंद निधेः प्रोक्तं, नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥३३॥
श्रृद्धाविशुद्धबुद्धिर्यः, पठत्यनु दिनं जनः ।
सतदेकमनाः सिद्धि – मुक्तां प्राप्नोत्यसंशय: ॥३४॥
तदप्राप्तौ वृथा मोक्ष-स्तदप्तौ तदगतार्थता ।
अतः सर्वोत्तमं स्तोत्रं, जप्यं कृष्ण रसार्थिभिः ॥३५॥
॥ इति श्रीमदग्निकुमारप्रोक्तं श्री सर्वोत्तमस्तोत्रं सम्पूर्णम् ||
सर्वोत्तम स्तोत्र
प्राकृत धर्मानाश्रय-मप्राकृत निखिल धर्म रूपमिति ।
निगम प्रतिपाद्यमं यत्-तच्छुद्वं साकृति सतौमि ॥१॥
अर्थ: श्रीविठ्ठलनाथजी कहते हैं कि जो प्राकृत धर्म के आश्रय से रहित तथा संपूर्ण अलौकिक धर्मस्वरूप हैं; इस प्रकार वेदों में प्रतिपादन किया गया है, और जो साकार तथा शुद्ध स्वरूप हैं, उनकी मैं स्तुति करता हूँ। ||१||
कलिकाल तमश्छन्न- दृष्टित्वा द्विदुषामपि ।
संप्रत्य विषयस्तस्य, माहात्म्यं समभूदभुवि. ॥२॥
अर्थ: ज्ञाता पुरुषों की भी ज्ञान-दृष्टि कलिकालरूपी अंधकार से आच्छादित है। इसलिए उस स्वरूप का माहात्म्य इस समय पृथ्वी पर अपरिचित हो गया है। ||२||
दयया निज माहात्म्यं, करिष्यन्प्रकटं हरिः ।
वाण्या यदा तदा स्वास्यं, प्रादुर्भूतं चकार हि ॥३॥
अर्थ: जब दयावश श्रीहरि को अपने वचनों के द्वारा अपना माहात्म्य प्रकट करने की इच्छा हुई, तब उन्होंने अपने मुखारविन्द का प्रादुर्भाव किया। ||३||
तदुक्तमपि दुर्बोधं, सुबोधं स्याद्यथा तथा ।
तन्नामाष्टोरतरशतं, प्रवक्ष्याम्यखिलाघहृत. ॥४॥
अर्थ: परन्तु उनका कहा हुआ दुर्बोध (कठिन) है। इसलिए जिस प्रकार वह सुबोध हो सके, उस प्रकार समस्त पापों का नाश करने वाले श्रीमहाप्रभुजी के एक सौ आठ नाम कहता हूँ। ||४||
ऋषिरग्नि कुमारस्तु, नाम्नां छन्दो जगत्यसौ ।
श्री कृष्णास्यं देवता च, बीजं कारुणिकः प्रभुः ॥५॥
अर्थ: इस स्तोत्र के ऋषि अग्निकुमार हैं और इसका छन्द जगती है। तथा श्रीकृष्ण के मुखारविन्दस्वरूप श्रीमहाप्रभुजी इसके देवता हैं और दयालु प्रभु ही इसका बीज हैं। ||५||
विनियोगो भक्तियोग:, प्रतिबंध विनाशने ।
कृष्णाधरामृता स्वाद- सिद्धिरत्र न संशयः ॥६॥
अर्थ: इस सर्वोत्तम स्तोत्र में समस्त प्रतिबन्धों के नाश के लिए विनियोग कहते प्रयोजन भक्तियोग है। तथा यहाँ श्रीकृष्णके अधरामृत के स्वाद की सिद्धि है। इसमें कोई संशय नहीं है। ||६||
आनंदः परमानंदः, श्रीकृष्णास्यं कृपानिधिः ।
दैवोद्धार प्रयत्नात्मा, स्मृतिमात्रार्तिनाशनः. ॥७॥
अर्थ: (१) जो आनन्दरूप हैं, (२) परमानन्दरूप हैं, (३) श्रीकृष्ण के मुखारविन्दस्वरूप हैं, (४) कृपा के सागरस्वरूप हैं, (५) दैवी जीवों के उद्धार के लिए अपने मन में प्रयत्न करने वाले हैं तथा (६) स्मरणमात्र से पीड़ा का नाश करने वाले हैं, वे श्रीमहाप्रभुजी हैं। ||७||
श्री भागवत गूढार्थ- प्रकाशन परायणः ।
साकार ब्रह्मवादैक, स्थापको वेदपारगः ॥८॥
अर्थ: (७) जो श्रीभागवत के गूढ़ अर्थ को प्रकाशित करने में तत्पर हैं, (८) साकार ब्रह्मवाद की स्थापना करने वाले हैं तथा (९) वेद का पार पाया है, वे श्रीआचार्य महाप्रभुजी हैं। ||८||
मायावाद निराकर्ता, सर्ववादि निरासकृत ।
भक्तिमार्गाब्जमार्तण्डः, स्त्रीशूद्राद्युदधृतिक्षमः ॥ ९॥
अर्थ: (१०) जो मायावाद का निराश करने वाले हैं, (११) सर्ववादियोंको निराश करने वाले हैं, (१२) भक्तिमार्ग का प्रवर्तन करने में सूर्यस्वरूप हैं तथा (१३) स्त्रियों और शूद्र आदि का उद्धार करने में समर्थ हैं, वे श्रीमहाप्रभुजी हैं। ||९||
अंगीकृतयैव गोपीश, वल्लभीकृतमानवः ।
अंगीकृतौ समर्यादो, महाकारुणिको विभुः. ॥१०॥
अर्थ: (१४) जो स्वयं अंगीकार करके ही मनुष्यों को गोपीश श्रीकृष्ण का वल्लभ (प्रिय) बनाते हैं, (१५) अंगीकार करने में मर्यादायुक्त हैं, (१६) महाकरुणामय हैं तथा (१७) सर्व करने में समर्थ हैं, वे श्रीआचार्यजी हैं। ||१०||
अदेयदानदक्षश्च, महोदारचरित्रवान ।
प्राकृतानुकृतिव्याज – मोहितासुर मानुषः ॥११॥
अर्थ: (१८) जो दान दिया नहीं जा सकता, वैसा दान देने में समर्थ हैं, (१९) उदार चरित्र वाले हैं तथा (२०) प्राकृत जनों का अनुकरणके बहाने आसुरी जीवोंको मोहित करने वाले हैं, वे श्रीआचार्यजी हैं। ॥११॥
वैश्वानरो वल्लभाख्यः, सद्रूपो हितकृत्सताम
जनशिक्षाकृते कृष्ण, भक्तिकृन्नि खिलेष्टदः ॥१२॥
अर्थ: (२१) जो अग्नि से प्रकट हुए हैं, (२२) वल्लभ नाम वाले हैं, (२३) सद्रूप वाले हैं, (२४) सत्पुरुषों का हित करने वाले हैं, (२५) श्रीकृष्ण की भक्ति करके मनुष्यों को शिक्षित करने वाले हैं तथा (२६) मनुष्य भगवान् के स्वरूप के सम्बन्ध में जो कुछ भी इच्छा करता है, वह समस्त इच्छित वस्तु प्रदान करने वाले हैं, वे श्रीआचार्यजी महाप्रभु हैं। ॥१२॥
सर्वलक्षण सम्पन्नः, श्रीकृष्णज्ञानदो गुरुः ।
स्वानन्दतुन्दिलः पद्म – दलायतविलोचनः ॥१३॥
अर्थ: (२७) जो सर्व लक्षणों से युक्त हैं, (२८) श्रीकृष्ण के ज्ञान का दान करने वाले हैं, (२९) मार्ग का उपदेश करने वाले गुरु हैं, (३०) स्वयं के आनन्द से परिपूर्ण हैं तथा (३१) जिनके नेत्र कमलदल के समान विशाल हैं, वे श्रीमहाप्रभुजी हैं। ॥१३॥
कृपादृग्वृष्टिसंहृष्ट, दासदासी प्रियः पतिः ।
रोषदृक्पात संप्लुष्ट – भक्तद्विट भक्त सेवितः ॥१४॥
अर्थ: (३२) जिनकी कृपाकटाक्षों की वर्षा से आनन्दित हुए दास-दासी भक्तजनों के प्रिय हैं, (३३) शरण में आए हुए जीवों के रक्षक (पति) हैं, (३४) रोसयुक्त दृष्टि से भक्तों के द्वेषियों का नाश करने वाले हैं तथा (३५) भक्तों द्वारा सेवित हैं, वे श्रीमहाप्रभुजी हैं। ॥१४॥
सुखसेव्यो दुराराध्यो, दुर्लभांध्रिसरोरुहः ।
उग्रप्रतापो वाक्सीधु, पूरिता शेषसेवकः ॥१५॥
अर्थ: (३६) जो सुखपूर्वक सेवा करने योग्य हैं, (३७) अलौकिक दुःख के द्वारा प्राप्त होने योग्य हैं, (३८) जिनके चरणरूपी कमल दुर्लभ हैं, (३९) उग्र (अत्यन्त) प्रतापी हैं तथा (४०) वाणीरूपी अमृत से समस्त सेवकों को परिपूर्ण करने वाले हैं, वे श्रीआचार्यजी हैं। ॥१५॥
श्री भागवत पीयूष – समुद्र मथनक्षमः ।
तत्सारभूत रासस्त्री भाव पूरित विग्रहः ॥१६॥
अर्थ: (४१) जो श्रीभागवतरूपी समुद्र का मन्थन करके अमृत लाने में समर्थ हैं तथा (४२) उस भागवत में सारभूत ऐसी रासक्रीड़ा को स्त्रीभाव से करके परिपूर्ण देह वाले हैं, वे श्रीमहाप्रभुजी हैं। ॥१६॥
सान्निध्यम्मात्रदत्त श्री कृष्णप्रेमा विमुक्तिदः ।
रासलीलैकतात्पर्यः, कृपयैतत्कथाप्रदः ॥१७॥
अर्थ: (४३) जो अपने सान्निध्यमात्र से ही भक्तों को श्रीकृष्णप्रेम का दान करने वाले हैं, (४४) भगवान् के साथ सम्बन्धरूप मुक्ति प्रदान करने वाले हैं, (४५) जिनका केवल रासलीला ही तात्पर्य (ध्यान) है तथा (४६) कृपा करके रासलीला सम्बन्धी श्रीकृष्ण की कथा कहने वाले हैं, वे श्रीमहाप्रभुजी हैं। ॥१७॥
विरहानुभवैकार्थ, सर्वत्यागोपदेशकः ।
भक्त्याचारोपदेष्टा च, कर्ममार्गप्रवर्तकः ॥१८॥
अर्थ: (४७) जो केवल विरह के अनुभव के लिए ही सर्वत्याग का उपदेश करने वाले हैं, (४८) भक्ति तथा भक्तिमार्ग के आचार का उपदेश करने वाले हैं तथा (४९) कर्ममार्ग का प्रवर्तन करने वाले हैं, वे श्रीआचार्यजी हैं। ॥१८॥
यागादौ भक्तिमार्गैक – साधनत्वोपदेशकः ।
पूर्णानन्दः पूर्ण कामो , वाक्पतिर्विबुधेश्वरः ॥१९॥
अर्थ: (५०) जो याग (यज्ञ) आदि कर्मों में भक्तिमार्ग को ही एकमात्र साधन बताते हैं, (५१) पूर्ण आनन्दस्वरूप हैं, (५२) पूर्ण अलौकिक काम वाले हैं, (५३) वाणी के अधिपति हैं तथा (५४) भक्तिमार्गीय ज्ञान के ईश्वर हैं, वे श्रीआचार्यजी हैं। ॥१९॥
कृष्णनामसहस्त्रस्य – वक्ता भक्तपरायणः ।
भक्त्याचारोपदेशार्थ – नानावाक्य निरूपकः ॥२०||
अर्थ: (५५) जो श्रीपुरुषोत्तम सहस्रनाम के प्रकाशक हैं, (५६) भक्तों के लिए शरणरूप हैं तथा (५७) भक्ति और आचार के उपदेश के हेतु विविध प्रकार के वचनों का निरूपण करने वाले हैं, वे श्रीआचार्यजी हैं। ॥२०॥
स्वार्थो जीजताखिल प्राण – प्रियस्ताद्रशवेष्टितः ।
स्व दासार्थ कृताशेष-साधनः सर्व शक्तिधृक ॥२१॥
अर्थ: (५८) सेवा के लिए जिन्होंने सेवा-विरोधी सर्व का त्याग करके अपने अखिल प्राण प्रभु को अर्पित कर दिए हैं, ऐसे भक्तों के प्रिय, (५९) ऐसे तादृशी भक्तों से परिवेष्टित (વિટલાયેલ) , (६०) जिन्होंने अपने दासों के लिए समस्त साधन किए हैं तथा (६१) सर्व शक्तियों को धारण करने वाले श्रीआचार्यजी हैं। ॥२१॥
भुवि भक्ति प्रचारैक-कृते स्वान्वयकृत पिता |
स्ववंशे स्थापिताशेष-स्वमहात्म्यः स्मयापहः ॥२२॥
अर्थ: (६२) जिन्होंने पृथ्वी पर केवल भक्ति का प्रचार करने के लिए अपने वंश का प्राकट्य किया, (६३) जो प्रेमलक्षणा भक्ति के पितृस्वरूप हैं, (६४) जिन्होंने अपने वंश में अपना सर्व माहात्म्य स्थापित किया तथा (६५) मोह का निवारण करने वाले हैं, वे श्रीमहाप्रभुजी हैं। ॥२२॥
पतिव्रतापतिः पार-लौकिकैहिक दानकृत ।
निगूढहृदयो नन्य – भक्तेषु ज्ञापिताशयः. ॥२३॥
अर्थ: (६६) जो महालक्ष्मीजी के पति हैं, (६७) अपने भक्तों को परलोक तथा इस लोक के फलों का दान करने वाले हैं, (६८) जिनके हृदय को यथार्थ रूप से जाना नहीं जा सकता तथा (६९) जो अनन्य भक्तों पर अपना अन्तःकरण प्रकट करने वाले हैं। ॥२३॥
उपासनादिमार्गाति, मुग्ध मोह निवारकः ।
भक्तिमार्गे सर्वमार्ग, वैलक्षण्यानुभूतिकृत ॥२४॥
अर्थ: (७०) जो उपासना (पूजा) आदि मार्गों में अत्यन्त मोहित हुए लोगों के मोह का निवारण करने वाले हैं तथा (७१) भक्तिमार्ग में सर्व मार्गों से भिन्न जो विलक्षणताएँ हैं, उनका अनुभव कराने वाले हैं, वे श्रीमहाप्रभुजी हैं। ॥२४॥
पृथक्शरण मार्गोप – देष्टा श्री कृष्णहार्दवित ।
प्रतिक्षण निकुंजस्थ, लीला रस सुपूरितः ॥२५॥
अर्थ: (७२) जो स्वतन्त्र भक्ति अथवा पुष्टिमार्गीय शरणमार्ग का उपदेश देने वाले हैं, (७३) श्रीकृष्ण के हृदय के फलात्मक भाव को जानने वाले हैं तथा (७४) प्रत्येक क्षण निकुञ्ज में हो रही लीला के रस से परिपूर्ण हैं, वे श्रीवल्लभ हैं। ॥२५॥
तत्कथाक्षिप्तचितस्तद् – विस्मृत|न्यो व्रजप्रियः ।
प्रिय व्रज स्थितिः पुष्टिलीलाकर्ता रहः प्रियः ॥२६॥
अर्थ: (७५) जिनका चित्त निकुञ्जलीला-रस की कथा में व्याकुल रहता है, (७६) जो निकुञ्जलीला में अन्य सर्व का विस्मरण करा देते हैं, (७७) जिन्हें व्रज प्रिय है, (७८) जिन्हें व्रज में निवास करना प्रिय है, (७९) जो पुष्टिलीला करने वाले हैं तथा (८०) जो एकान्तिक भक्ति में प्रीति रखने वाले हैं, वे श्रीआचार्यजी हैं। ॥२६॥
भक्तेच्छा पूरकः सर्वा, ज्ञातलीलोतिमोहनः ।
सर्वासक्तो भक्तमात्रा-सक्तः पतितपावनः ॥ २७॥
अर्थ: (८१) जो भक्त की इच्छा को पूर्ण करने वाले हैं, (८२) जिनकी लीलाओं को अन्य सर्व नहीं समझ सकते, (८३) जो भक्तों को अत्यन्त मोहित करने वाले हैं, (८४) सर्व जीवों में आसक्ति से रहित हैं, (८५) केवल भक्त के प्रति आसक्त हैं तथा (८६) पतित जीवों को पवित्र करने वाले हैं, वे श्रीआचार्यजी हैं। ॥२७॥
स्वयशोगानसंहऋष्ठं , ऋदयाम्भोजविष्टरः ।
यशः पीयूष्लहरी, प्लावितान्यरसः परः. ॥२८॥
अर्थ: (८७) जो अपने यश का गान करने से प्रसन्न हुए भक्त के हृदयरूपी कमल में विराजमान होते हैं, (८८) भक्तों के भक्तिरस के अतिरिक्त अन्य सभी रस को स्वयं के यशरूप अमृत की लहर से भिगोए हुए हैं तथा (८९) सर्व से श्रेष्ठ हैं, वे श्रीमहाप्रभुजी हैं। ॥२८॥
लीलामृतरसार्द्रार्द्री, कृताखिलशरीरभृत ।
गोवर्धनस्थित्युत्साह:, तल्लीला प्रेमपूरितः ॥२९॥
अर्थ: (९०) जो लीलारूपी अमृत के रसिक भाव से समस्त शरीरधारियों को रसयुक्त करने वाले हैं, (९१) जिन्हें श्रीगोवर्धन गिरिराज में ही निवास करने का उत्साह है तथा (९२) जो उस भगवद्-लीला (गिरिराजजी सम्बन्धित लीला) में प्रेमरस से परिपूर्ण हैं, वे श्रीमहाप्रभुजी हैं। ॥२९॥
यज्ञभोक्ता यज्ञकर्ता, चतुर्वर्ग विशारदः ।
सत्य प्रतिज्ञ स्त्रिगुणा-तीतो नयविशारदः. ॥३०॥
अर्थ: (९३) जो यज्ञ के भोक्ता हैं, (९४) यज्ञ के कर्ता हैं, (९५) धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के तत्त्व में निपुर्ण हैं, (९६) सत्य प्रतिज्ञा वाले हैं, (९७) तीनों गुणों (रजस्, तमस् और सत्त्व) से रहित हैं तथा (९८) नीति में निपुर्ण हैं, वे श्रीआचार्यजी हैं। ॥३०॥
स्वकीर्तिवर्द्धनस्तत्व-सूत्रभाष्यप्रदर्शकः ।
माया वादाख्य तूलाग्नि-र्ब्रह्मवादनिरूपकः. ॥३१॥
अर्थ: (९९) जिन्होंने अपने मार्ग के ग्रन्थों की रचना करके अपनी कीर्ति का विस्तार किया, (१००) जो ब्रह्मसूत्रों के भाष्यकार हैं, (१०१) मायावादरूपी कपास (रूई) में अग्नि के समान हैं तथा (१०२) ब्रह्मवाद का प्रतिपादन करने वाले हैं, वे श्रीआचार्यजी हैं। ॥३१॥
अप्राकृताखिलाकल्प-भूषितः सहजस्मितः ।
त्रिलोकीभूषणं भूमि-भाग्यं सहज सुन्दरः ॥३२॥
अर्थ: (१०३) जो व्याससूत्रों के फलाध्याय के भगवद्भाव-लीलारस के निरूपण से सुशोभित आभूषणस्वरूप हैं, (१०४) सहज हास्य वाले हैं, (१०५) तीनों लोकों में भूषण के समान हैं, (१०६) पृथ्वी के भाग्यस्वरूप हैं तथा (१०७) सहज सुन्दर हैं, वे श्रीमहाप्रभुजी हैं। ॥३२॥
अशेष भक्त संप्रार्थ्य, चरणाब्ज रजोधनः ।
इत्यानंद निधेः प्रोक्तं, नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥३३॥
अर्थ: (१०८) जिनके चरणकमलों की रजरूपी धन की भक्तजन प्रार्थना करते हैं, वे श्रीआचार्यजी महाप्रभुजी हैं। इस प्रकार आनन्दसागर श्रीमहाप्रभुजी के एक सौ आठ नाम कहे गए। ये उन्हीं गुणों के सिद्धान्तरूप नाम कहे गए हैं। ॥३३॥
श्रृद्धाविशुद्धबुद्धिर्यः, पठत्यनु दिनं जनः ।
सतदेकमनाः सिद्धि – मुक्तां प्राप्नोत्यसंशय: ॥३४॥
अर्थ: श्रद्धापूर्वक विशुद्ध बुद्धि वाला जो मनुष्य सदा निश्चययुक्त मन वाला होकर तथा नित्य एकचित्त होकर इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह जीव कही गई महासिद्धि (श्रीकृष्ण-अधरामृत-स्वाद) को प्राप्त करता है। इसमें कोई संशय नहीं है। ॥३४॥
तदप्राप्तौ वृथा मोक्ष-स्तदप्तौ तदगतार्थता ।
अतः सर्वोत्तमं स्तोत्रं, जप्यं कृष्ण रसार्थिभिः ॥३५॥
अर्थ: उस सिद्धि की प्राप्ति के बिना मोक्ष भी व्यर्थ है। और यदि स्वमार्ग सम्बन्धी उस सिद्धि की प्राप्ति हो जाए, तो सायुज्य आदि मोक्ष भी निरर्थक हैं। अतः इस सर्वोत्तम स्तोत्र का जप श्रीकृष्णचन्द्ररूप रस की इच्छा रखने वाले जीवों द्वारा किया जाना योग्य है। ॥३५॥
॥ इति श्रीमदग्निकुमारप्रोक्तं श्री सर्वोत्तमस्तोत्रं सम्पूर्णम् ||
रचना
यह स्तोत्र श्री महाप्रभुजी का नामात्मक स्वरूप है | श्री गुसाईजी प्रभुचरण ने श्री महाप्रभुजी के विविध चरित्रों का वर्णन करते हुए १०८ नाम का आलेखन यह स्तोत्र मे किया है |
महात्म्य
वैष्णवन यह स्तोत्र का पठन नित्य करने से श्री महाप्रभुजी के ग्रंथ सहजता से अध्ययन हो सकते है | यह ग्रंथ वैष्णवन के लिए गायत्री तुल्य है | महात्म्य का एक सुंदर प्रसंग भी है …
प्रसंग
श्री गुसाईजी के द्वितीय लालन श्री गोविंदरायजी के लालन श्री कल्याणरायजी के लालन श्री हरीराय महाप्रभुजी को बचपन से ही सत्संग मे अद्भुत रुचि …. गुरु और वैष्णवन के मध्य के मर्यादा का ध्यान धरे बिना आप वैष्णवन की टोली मे उनके साथ बिराजके नित्य सत्संग करते | बड़े लोगों ने समजाया की गुरु शिष्य के संबंध को ध्यान मे रख के गुरु स्थान पर बिराजीए | बाल स्वरूप होने से क्रम चालू रहा | इसलिए बड़े लोगों ने खंड मे बंध किया |
तब श्री हरीराय महाप्रभुजी को सत्संग का अत्यंत विरह हुआ इसलिए आपने श्री सर्वोत्तम स्तोत्र के तीन दिन तक निरंतर श्री सर्वोत्तम स्तोत्र का पठन किया | अलौकिक फल स्वरूप साक्षात श्री महाप्रभुजी ने श्री विठ्ठलनाथ जी के साथ दर्शन दिए | कुछ एस महात्म्य है श्री सर्वोत्तम स्तोत्र का | वैसे श्री हरीराय महाप्रभु चरण का सामर्थ्य अतुल्य है | श्री सर्वोत्तम स्तोत्र के नित्य संपूर्ण दृढ़ भाव से पठन करने से श्री महाप्रभुजी जीव का अधिकारित्व जानकार विभिन्न स्वरूप से दर्शन देते है |
