अक्षय नवमी पुष्टिमार्ग

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तिथि : कार्तिक शुक्लपक्ष नवमी

आज के उत्सव को आंवला नवमी भी कहते  है | आज आंवला व कुष्मांड अर्थात सफ़ेद पेठा  का दान किया जाता है | पुष्टिमार्ग में आंवला भोग की वर्जना है | अतः सभी पुष्टिमार्गीय मंदिरों में पेठा की सामग्रियां सिद्ध कर श्री ठाकुरजी को अरोगायी जाती है |

श्री कृष्ण लीला प्रसंग :

गोवर्धन पूजा के उत्सव पर प्रभु श्री कृष्ण ने व्रजवासी को इन्द्र देव की पूजा न करके गिरीराजजी एवं गायों का पूजन करने की सलाह दी | गोवर्धन पूजा की | अन्नकूट धराया | यह जब इन्द्रदेव को ज्ञात हुआ तब अहंकार वश उन्होंने व्रजमंडल मे भारी वर्षा प्रारंभ करदी | प्रलय की स्थिति उत्पन्न करदी | 

गोविंदाभिषेक अक्षय नवमी

तब हमारे प्रभु ने श्री गोवर्धननाथजी स्वरूप से गोवर्धन धारण किया | सकल व्रज परिकर को सनाथ किया | जब स्थिति और विकराल होने लगि तब व्रजवासी घबराए | तब प्रभु ने श्री गोकुलनाथजी स्वरूप से एक श्री हस्त से गोवर्धन धारण किया हुआ है | दूसरे श्री हस्त से संख धरा है |

जो संख समग्र जल एवं आंधी तूफान का शोषण करने लगा | और व्रजभक्तों को अनन्याश्रय सिद्ध करवाने हेतु दूसरे दो श्री हस्त प्रकट करके सबका भय दूर कर उनका आश्रय दृढ़ किया | सात दिवस निरंतर वर्षा के बाद भी व्रज मे कोई हानी नहीं हुई  | जैसा था वैसे ही रहा |

गोविंदाभिषेक अक्षय नवमी
Gokulnathji Nidhi Swaroop

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तब इन्द्रदेव के मद का दमन हुआ | माता की आज्ञा से सुरभि गाय को साथ लिए , ऐरावत पर बिराजकर प्रभु के चरणों मे आए | अपराध के लिए क्षमा याचना की | सुरभि गाय के कारण प्रभु ने उनको क्षमा किया | सुरभि गौ माता ने प्रभु को आपके स्वामी – भगवान मानकर “गोविंद”  कहकर पुकारा | प्रभु गाय – गौ एवं इंद्रिय के स्वामी है |

फिर इन्द्र देव ने एरावत की सुंढ से जल का अभिषेक एवं  सुरभि गाय के दूध से प्रभु का दुग्ध अभिषेक किया | उस कारण से इस उत्सव को गोविंदाभिषेक भी कहा जाता है |

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अभिषेक से एक कुंड का निर्माण हुआ | जिसे गोविंद कुंड के रूपमे जाना गया | जहा निश्छल  वैष्णवों को आजभी भाव से दर्शन करने पर दुध  की धारा के दर्शन होते है |

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इन्द्रदेव ने प्रभु के प्रति दिन के आठ भोग तब सात दिन के कुल छप्पन भोग प्रभु धरके प्रभु की सेवा की | प्रभु ने प्रसन्न होकर उनको आपका गोकुलनाथजी का स्वरूप सेवा मे पधराया | जो आज गोकुल मे चतुर्थ गृह निधि के रूप मे बिराजमान है |

श्रीनाथजी दर्शन – अक्षय नवमी 

गोविंदाभिषेक अक्षय नवमी श्रीनाथजी दर्शन

आज अन्नकूट के वस्त्र, श्रृंगार ही होवे। पुरे दिन तुलसी की माला आवे। भोग आरती में तुलसी की गोवर्धन माला आवे।

वस्त्रः- चागदार बागा, चोली, कूल्हे सब फुलकशाही, रूपहरी जरी के। सुथन लाल सलीदार जरी की। पटका सुनहरी जरी को। ठाड़े वस्त्र अमरसी। गोकर्ण लाल जरी के। पिछवाई चितराम की, बड़ी गायन की। अब शीतकाल में चितराम की पिछवाई नहीं आवे।

आभरणः- श्रृंगार दो जोड़ी के। एक माणक की, एक पन्ना की। सब आभरण को मेल अन्नकूट जेसो मिलानो। टोडर, त्रवल दोनों आवे। चोटीजी धरावे। बनमाला को श्रृंगार। कस्तूरी, कली आदी सब आवे। श्रीमस्तक पे पांच मोर चन्द्रिका को जोड़ धरावे। वेणुजी हीरा के, वेत्र एक हिरा को, एक सोना को। पट नित्य को, गोटी जडाऊ।

आरती पीछे श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े करके, छेड़ान के श्रृंगार करने। कूल्हे रहे जासु लूम तुर्रा नहीं आये। पिछवाई फुलक शाही जरी की धरावे।

शयन भोग में पेठा बड़ी को शाग अरोगे। केसर युक्त पेठा आवे।

मंगला – प्रथम गौचारण चले गोपाल 

राजभोग – सोहत लाल लकूट कर राती 

शयन – कैसे कैसे गाय चराई 

पोढवे – राय गिरधरन संग राधिका रानी

Seva kram  courtesy: Shrinathji Temple Nathdwara Management | 

धन तेरस से देव प्रबोधिनी एकादशी के सभी उत्सव के पद, (धन तेरस के पद, रूप चतुर्दशी के पद, दीपावली के पद, दीपमालिका के पद, हटरी के पद, कान जगाई के पद, अन्नकूट के पद, गोवर्धन पूजन के पद, भाई दूज के पद, गोपाष्टमी के पद, देव प्रबोधिनी एकादशी के पद) नीचे उपलब्ध ई-बुक मे प्राप्य है |

धन त्रयोदशी से देव प्रबोधिनी एकादशी के पद

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पुष्टिमार्ग निधि स्वरूप गोकुलनाथजी – श्री गोवर्धननाथजी की स्वरूप भावना, लीला, प्राकट्य प्रसंग, इतिहास की जानकारी नीचे दी गई ई-बुक मे प्राप्य है |

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