श्री कृष्णाश्रय: – षोडस ग्रंथ
श्री वल्लभाचार्य जी महाप्रभुजी रचित षोडस ग्रंथ मे से एक श्री कृष्णाश्रय: ग्रंथ |
श्रीकृष्णाश्रय:
सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खल धर्मिणि ।
पाष्ण्ड प्रचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम ॥१॥
अर्थ: खल (ऊपर से अच्छा दिखाई देने वाला और भीतर से दुष्ट) धर्म वाले कलियुग में भगवान् की प्राप्ति के सभी मार्ग नष्ट हो गए हैं। और लोक में पाखण्ड का प्रचार हो रहा है। इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण ही मेरा आधार हैं। ॥१॥
म्लेच्छाक्रान्तेषु देशेषु पापैक निलयेषु च ।
सत्पीडा व्यग्र लोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥२ ॥
अर्थ: शुद्ध माने जाने वाले सभी देश भी म्लेच्छों से घिरे हुए हैं, इसलिए वे सभी केवल पापियों के निवासस्थान बन गए हैं। तथा सज्जनों को होने वाली पीड़ा को देखकर लोग व्यग्र (अधीर) हो रहे हैं। इस दशा में श्रीकृष्ण ही मेरी गति हों। ॥२॥
गंगादि तीर्थ वर्येषु दुष्टैरेवा वृते ष्विह ।
तिरोहिता धिदेवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥३॥
अर्थ: इस समय गङ्गाजी आदि उत्तम तीर्थ चारों ओर से दुष्टों से घिरे हुए हैं। और उनका आधिदैविक स्वरूप तिरोहित हो गया है। ऐसी स्थिति में श्रीकृष्ण ही मेरा आश्रय हैं। ॥३॥
अहंकार विमुढेषु सत्सु पापानुवर्तिषु ।
लाभ पूजार्थ यत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥४॥
अर्थ: सत्पुरुष अभिमान से मूढ़ होते जा रहे हैं। पाप और पापियों का अनुसरण करने वाले हो रहे हैं| तथा लाभ और प्रतिष्ठा के उद्देश्य से ही प्रयत्न कर रहे हैं। इस अवस्था में श्रीकृष्ण ही मेरा आश्रय हैं। ॥४॥
अपरिज्ञान नष्टेषु मन्त्रेष्वव्रत योगिषु ।
तिरोहितार्थ देवेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥५॥
अर्थ: मंत्रो का रहस्य, ज्ञान के अभाव के कारण तथा व्रत और नियमपूर्वक मंत्रोका अध्ययन न किए जाने के कारण, और मंत्रो के अर्थ एवं देवताओं के तिरोहित हो जाने के कारण, मंत्र नष्टप्राय हो गए हैं। श्रीकृष्ण ही मेरा आश्रय हैं। ॥५॥
नानावाद विनष्टेषु सर्व कर्म व्रतादिषु ।
पाषंडेक प्रयत्नेषु कृष्ण एव गतिर्मम ॥६॥
अर्थ: समस्त कर्म, व्रत आदि विभिन्न प्रकार के वाद (मतों) के कारण नष्ट हो गए हैं। और (वादियों) का केवल पाखण्ड के लिए ही प्रयत्न है। इसलिए श्रीकृष्ण ही मेरा आश्रय हैं। ॥६॥
अजामिला दिदोषाणां नाशको नुभवे स्थितः ।
ज्ञापिताखिल माहात्म्यः कृष्ण एव गतिर्मम ॥७||
अर्थ: अजामिल आदि के दोषों का नाश करने वाले अनुभव में स्थित हैं। और उनके द्वारा अपना समस्त माहात्म्य प्रकट करने वाले श्रीकृष्ण ही मेरा आश्रय हैं। ॥७॥
प्राकृताः सकला देवा गणितानन्दकं बृहत ।
पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात कृष्ण एव गतिर्मम ॥८॥
अर्थ: समस्त देवताएँ प्रकृति के कार्यरूप हैं, अक्षरब्रह्म तो गणना किए जा सकने वाले आनन्द वाला है, जबकि श्रीकृष्ण पूर्ण आनन्द स्वरूप हैं। इसलिए श्रीकृष्ण ही मेरा आश्रय हैं। ॥८॥
विवेक धैर्य भक्त्यादि रहितस्य विशेषतः ।
पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम ॥९॥
अर्थ: विवेक, धैर्य, नवधा-भक्ति आदि से रहित (विहीन) तथा विशेष रूप से पाप में आसक्त, साधनहीन और दीन ऐसा मैं हूँ। इसलिए श्रीकृष्ण ही मेरा आश्रय हैं। ॥९॥
सर्व सामर्थ्य सहितः सर्वत्रैवा खिलाथॅकृत ।
शरणस्थ समुद्धारं कृष्णं विज्ञापयाम्यहम ॥१०॥
अर्थ: सर्व प्रकार की सामर्थ्य से युक्त, सभी विषयों में सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाले तथा शरण में आए जीव का उद्धार करने वाले श्रीकृष्ण से मैं विज्ञप्ति (विनती) करता हूँ। ॥१०॥
कृष्णाश्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेत कृष्ण सन्निधौ ।
तस्याश्रयो भवेत कृष्ण इति श्री वल्लभोब्रवीत ॥११॥
अर्थ: कृष्णाश्रय नामक इस स्तोत्रका जो कोई श्रीकृष्ण भगवान् के समीप पाठ करता है, उसका श्रीकृष्ण स्वयं आश्रय बनें, यह श्रीमद् वल्लभ का वचनामृत है । ॥११॥
॥ इति श्रीमद् वल्लभाचार्यविरचितः कृष्णाश्रय स्तोत्रं सम्पूर्णः ॥
