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DESCRIPTION:श्रीनाथजी को पाटोत्सवः ।  \nखर्च-भण्डार में जिस स्थान पर प्रभु विराजे उस स्थान पर श्रीजी की छवि स्थित है और उसकी सेवा प्रतिदिन श्रीजी के घी-घरिया करते हैं. आज खर्च-भंडार में विराजित श्रीजी की छवि को सैंकड़ों लीटर केसर व मेवे युक्त दूध का भोग अरोगाया जाता है और शयन पश्चात सभी वैष्णवों एवं नगरवासियों को वितरित किया जाता है.\nआज से सेवाक्रम में कुछ परिवर्तन होंगे.\nआज से डोलोत्सव तक श्रीजी और श्री नवनीतप्रियाजी में ख्याल (स्वांग) प्रारंभ होंगे. ख्याल बनने वाले बालक\, बालिकाएं विविध देवों\, गन्धर्वों एवं सखाओं के रूप धरकर ख्याल बनकर शयन के दर्शन में प्रभु के समक्ष नाचते हैं जिससे बालभाव में प्रभु आनंदित होते हैं.\nकई वर्षों पूर्व जब प्रभु व्रज में थे तब वहां इस प्रकार के ख्याल (स्वांग) निकलते थे. श्रीजी का मन ऐसे ख्याल (स्वांग) देखने बाहर जाने का हुआ तब श्री गिरधरजी ने प्रभु के सुखार्थ सतघरा में ही ख्याल (स्वांग) बनाने की प्रथा प्रारंभ की जो कि आज भी जारी है.\nपुष्टिमार्ग में प्रत्येक ऋतु का आगमन व पूर्व ऋतु की विदाई प्रभु सुखार्थ धीरे-धीरे क्रमानुसार होती है.\nप्रभुसेवा में आज से शीतकाल की विदाई आरंभ हो गयी है अतः जल रंगों के चित्रांकन की पिछवाईयां धरायी जानी प्रारंभ हो जाती है.\nआज से डोलोत्सव तक इस प्रकार की पिछवाईयां केवल श्रृंगार के दर्शनों में ही धरायी जाती हैं एवं ग्वाल में बड़ी (हटा) कर सफ़ेद मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती हैं क्योंकि राजभोग में प्रभु को गुलाल खेलायी जाती है.\nआज से प्रभु को मोजाजी भी नहीं धराये जाते परन्तु यदि अधिक शीत हो तो आज का दिन छोड़कर प्रभु सुखार्थ शीत रहने तक मोजाजी पुनः धराये जा सकते हैं. \nश्रीजी का सेवाक्रम :  \nउत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को पूजन कर हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.\nआज निज मंदिर का चंदुआ बदला जाता हैं. मंगला दर्शन पश्चात प्रभु को चन्दन\, आवंला\, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है. सभी समय यमुनाजल की झारीजी भरी जाती है. चारों दर्शनों (मंगला\, राजभोग संध्या-आरती व शयन) में आरती थाली में होती है.\nराजभोग में 6 बीड़ा की शिकोरी(स्वर्ण का जालीदार पात्र) आवे.\nश्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में खरमंडा\, केसर-युक्त गेहूं के रवा (संजाब) की खीर\, श्रीखंडवड़ी का डबरा\, मंगोड़ा (मूंग की दाल के गोल दहीवड़ा) की छाछ व दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी का भोग अरोगाया जाता है.\nआज से श्रीजी के चरणारविन्द के श्रृंगार होते है. यदि ठण्ड हो तो राजभोग तक मोजाजी धराये जा सकते है. \nश्रीजी दर्शन :\nसाज : आज प्रभु को होली के सुन्दर चित्रांकन वाली पिछवाई धरायी जाती है जिसमें व्रजभक्त प्रभु को होली खिला रहे हैं और ढप वादन के संग होली के पदों का गान कर रहे हैं. गादी\, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.राजभोग में श्वेत मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल\, चन्दन से खेल किया जाता है.\nवस्त्र : आज श्रीजी को केसरी (अमरसी) डोरिया के दोहरा रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन\, घेरदार वागा\, चोली एवं कटि-पटका धराये जाते हैं. चोली के ऊपर आधी बाँहों वाली श्याम रंग की चोवा की चोली धरायी जाती है. ठाड़े वस्त्र श्वेत चिकने लट्ठा के धराये जाते हैं.\nश्रृंगार : आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है.\nआभरण सभी फ़ीरोज़ा के धराये जाते हैं.\nश्रीमस्तक पर हल्के केसरी (अमरसी) रंग की गोल पाग के ऊपर सिरपैंच\, लूम की कीलंगी एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में फ़िरोज़ा के एक जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.\nश्रीकंठ में चार माला धरायी जाती है.\nश्रीजी को फूलघर की सेवा में आज गूंजा माला के साथ पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी फूल पत्तियों की कलात्मक थागवाली मालाजी धरायी जाती हैं.\nश्रीहस्त में पुष्पछड़ी\, फ़ीरोज़ा के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.\nप्रभु के श्री चरणों में पैजनिया\, नुपुर व बिच्छियाँ धराई जाती है.\nपट चीड़ का एवं गोटी फागुन की आती है.\nआरसी उत्सववत दिखाई जाती है.\nश्रीजी की राग सेवा के तहत आज\nमंगला : हो हो होरी खेलन जाइये\nराजभोग : अष्टपदी\, धन धन नन्द जसुमति\nआरती : श्री गोकुल राज कुंवर\nशयन : श्री गोवर्धन राय लाला\nपोढवे : चले हो भावते रस एन\nकीर्तनों का प्रभु के सन्मुख गायन किया जाता है.\nश्रीजी सेवा का अन्य सभी क्रम नित्यानुसार रहता है जैसे कि मंगला\, राजभोग\, आरती एवं शयन दर्शन में आरती उतारी जाती है.\nनित्य नियमानुसार मंगलभोग\, ग्वालभोग\, राजभोग\, शयनभोग में विविध सामग्रियों का भोग आरोगाया जाता है.\nश्रीजी के कपोल पर गुलाल अबीर से सुन्दर चित्रांकन किया जाता है.\nराजभोग के दर्शनों में भारी खेल होता है और दर्शनार्थी वैष्णवों पर पोटली से गुलाल अबीर उडाये जाते है.\nसायंकालिन भोग दर्शनों के भोग में खेल के साज के भोग अरोगाये जाते है जिसमे सूखे मेवा\, फलों तथा दूधघर की सामग्रियों की अधिकता रहती है.    Source : Shrinathji Temple Management\n       : facebook page : Shreenathji Nity darshan \nVasant Nitya Seva Kirtan
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SUMMARY:माघ शुक्लपक्ष 15
DESCRIPTION:होरी डांडो दण्डारोपणं \nमाघ स्नान की समाप्तिः। होरी डांडो दण्डारोपणं\, आज सूर्यास्तान्तरम् सायं ६ बजके १८ मिनिट पश्चात्\, याही समय धमार को आरम्भ\, रोपणी को उत्सव। \nचटकीली चोली पहेरें बीच बीच चोवा लपटानो ।\nपरम प्रिय लागत प्यारीको अपने प्रीतम को बानो ।।१।।\nदेखत शोभा अंगअंगकी मनसिज मन हिल जानो ।\nसुधरराय प्रभु प्यारीकी छबि निरखत मोह्यो गोवर्धनरानो ।।२।। \nहोली डांडा रोपण (रोपणी को उत्सव)\, छप्पनभोग मनोरथ (बड़ा मनोरथ) \nविशेष – बसंत पंचमी से आज माघ शुक्ल पूर्णिमा तक के दिन बसंत के खेल के कहे जाते हैं.\nइन दस दिनों में प्रिया-प्रीतम को युगल स्वरुप के रूप में पधराकर शांत भाव से सूक्ष्म खेल किया जाता है. प्रकृति के सौन्दर्य के दर्शन का आनंद विशेष प्रकार से लिया जाता है जो कि बसंत के कीर्तनों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है.\nश्यामसुंदर को मूर्तिमंत बसंत स्वरुप जान के भक्तजन इसका वर्णन कर प्रभु को रिझाते हैं.  \n“देखो प्यारी कुंजविहारी मूरतिमंत वसंत l\nमोर तरुन तरुलता तन में मनसिज रस वरसंत ll” \nआज माघ शुक्ल पूर्णिमा को होली डांडा रोपण के पश्चात से दस दिन धमार खेल के होंगे. तत्पश्चात फाल्गुन कृष्ण एकादशी से आगामी दस दिन फाग के और फाल्गुन शुक्ल षष्ठी से अंतिम दस दिन होली के खेल होते हैं.  \nइस प्रकार 40 दिनों की होली खेल की सेवा चार (बसंत\, धमार\, फाग एवं होली) रीतियों से की जाती हैं. होली खेल की लीला का स्वरुप ऐसा है कि जैसे-जैसे दिन व्यतीत होते जाते हैं\, वैसे-वैसे होली के खेल में वृद्धि होती जाती है.\nबसंत का खेल नन्दभवन में\, धमार का खेल पोल (पोरी) में\, तीसरा फाग का खेल गली में और चौथा होली का खेल गाँव के बाहर के चौक में खेला जाता है. \nश्रीजी में आज रोपणी का उत्सव है अर्थात आज होली डांडा रोपण किया जाता है.\nव्रज में प्राचीन परम्परानुसार होली-डांडा रोपण होली के एक मास पूर्व आज पूर्णिमा के दिन गाँव के चौक अथवा गाँव के बाहर किया जाता है.\nयमुना पुलिन\, गिरिराज जी\, वृन्दावन\, कुंज-निकुंजों आदि में डांडा रोपण किया जाता है.  \nइसके पीछे यह भावना है कि व्रजभक्तों को सुख-दान हेतु प्रभु रसक्रीड़ा करते हैं तब एक मास तक निर्विध्न सब खेल हों इसके लिए ब्राह्मण स्वस्तिवाचन\, मंत्रोच्चार एवं वेद-ध्वनि कर डांडा रोपण करते हैं.\nडांडा के ऊपर लाल रंग की ध्वजा फहरायी जाती है जो कि हार-जीत की प्रतीक है अर्थात योगी प्रभु श्रीकृष्ण को अपने वश में करने आये कामदेव की चुनौती प्रभु ने स्वीकार कर ली है.\nनंदरायजी\, वृषभानजी\, बड़े गोप\, यशोदाजी\, गोपी-ग्वाल\, गोपाल\, बलदेव आदि सभी दंडवत प्रणाम कर धमार का प्रारंभ करते हैं. \nआज से प्रतिदिन राजभोग दर्शन में प्रभु के मुखारविंद (कपोल) पर गुलाल लगायी जाती है. \nआज से श्रीजी में गुलाल की फेंट (पोटली) भरी जाती है\, पुष्प की छड़ी एवं गुलाल पिचकारी धरी जाती है\, गुलाल-अबीर का खेल भारी होता जाता है\, होली की गालियाँ भी गायीं जाती है और झांझ\, मृदंग\, ढप बांसुरी आदि वाध्य बजाये जाते हैं.  \nआज का उत्सव श्री यमुनाजी की सेवा के दस दिन की पूर्णता का उत्सव है. फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा से दस दिन धमार के दिन कहे जाते हैं और ये श्री चन्द्रावलीजी की सेवा के दिवस हैं.  \nश्रीजी में बसंत पंचमी से केवल वसंत राग के पद गाये जाते हैं जबकि होली-डांडा रोपण के पश्चात धमार का प्रारंभ हो जायेगा अर्थात आज से अन्य राग के पद भी गाये जा सकेंगे. धमार एक विशिष्ट ताल होती है और आज से दस दिनों तक इस ताल के पद भी गाये जायेंगे. आज से डोलोत्सव तक मान के पद नहीं गाये जाते हैं. \nआज से एक मास तक श्रीजी को कुल्हे का श्रृंगार नहीं धराया जाता क्योंकि कुल्हे का श्रृंगार बाल-भाव का श्रृंगार माना जाता है और होली-खेल की लीला किशोर-भावना की है अतः सेहरा\, मुकुट\, टिपारा आदि के श्रृंगार धराये जाते हैं. घेरदार वागा अधिक धराये जाते हैं और श्रीमस्तक पर मोरचन्द्रिका के बदले कतरा\, मोरशिखा\, गोल-चंद्रिका\, चमक की चंद्रिका आदि धराये जाते हैं. \nआज प्रभु को नियम के श्वेत घेरदार वस्त्रों के ऊपर चोवा की चोली धरायी जाती है. श्रीमस्तक पर श्वेत रंग की पाग के ऊपर मोरपंख का दोहरा कतरा धराया जाता है. \n श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में सिकोरी (मूंग की दाल\, इलायची व मावे के मीठे मसाले से भरी तवापूड़ी जैसी सामग्री) व दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी का भोग अरोगाया जाता है.  \nराजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है एवं सखड़ी में केसरी पेठा एवं मीठी सेव आरोगाये जाते हैं.\nभोग में फीका की जगह चालनी अरोगायी जाती हैं. \nFacebook Page:  Shreenathjinitydarshan \nराजभोग दर्शन –  \nकीर्तन – (राग : वसंत) \nलालन संग खेलन फाग चली l\nचोवा चन्दन अगर कुंकुमा छिरकत गोख गली ll 1 ll\nऋतु वसंत आगम नव नागरी जोबन भार भरी l\nदेखत चली लाल गिरिधरको नंदजुके द्वार खरी ll 2 ll\nरातीपीरी चोली पहेरें नौतन झुमक सारी l\nमुखहि तंबोल नेनमें काजर देत भामती गारी ll 3 ll\nबाजत ताल मृदंग बांसुरी गावत गीत सुहाये l\nनवल गुपाल नवल व्रजवनिता निकसि चोहटे आये ll 4 ll\nदेखो आई कृष्णजुकीलीला विहरत गोकुल माहीं l\nकहत न बने दास ‘परमानंद’ यह सुख अनतजु नाहीं ll 5 ll \nसाज – आज श्रीजी में आज सफ़ेद रंग की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल\, चन्दन से खेल किया गया है. गादी\, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है. \nवस्त्र – आज श्रीजी को सफ़ेद रेशम का सूथन\, चोवा की श्याम चोली एवं सफ़ेद घेरदार वागा धराये जाते हैं. सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सफ़ेद मोठड़ा का कटि-पटका ऊर्ध्वभुजा की ओर धराया जाता है. मेघश्याम रंग के मोजाजी एवं लाल रंग के ठाड़े वस्त्र धराये जाते हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर\, गुलाल आदि की टिपकियों से कलात्मक रूप से खेल किया जाता है. \nश्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं.\n श्रीमस्तक पर श्वेत स्याम खिड़की की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच\, सुनहरी फ़ोन्दना का दोहरा मोरपंख का कतरा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में चार कर्णफूल धराये जाते हैं.\nआज चार माला तायत वाली धरायी जाती हैं. आज त्रवल नहीं धराया जाता हैं कंठी धरायी जाती हैं.\n लाल एवं पीले पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.\n श्रीहस्त में पुष्प की छड़ी\, स्वर्ण के बटदार वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.\n पट चीड़ का एवं गोटी चाँदी की आती हैं.\nआरसी बड़ी डाँडी की दिखाई जाती हैं.\nसंध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा सुनहरी धराये जाते हैं. \nSource : Shrinathji nitya darshan facebook page \nVasant Nitya Seva Kirtan
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SUMMARY:माघ शुक्लपक्ष 5
DESCRIPTION:बसन्त पंचमी  ।       वसंत पंचमी सेवा क्रम :\nआज से बसंत ऋतु का आगमन हो रहा है. आज भगवान श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न जी का प्राक्टयोत्सव है \, जो कामदेव के अवतार हैं।  इसलिए आज इसे मदन महोत्सव भी कहा जाता है। वसंत पंचमी से 40 दिनों तक प्रभु सेवा में दास्य भाव के स्थान पर सख्य भाव – सखाभाव से उत्सव मनाया जाता है। आज से सेवा में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. आज से शित्कालीन सेवकराम के शितोपचार वडा होंगे। और सफेद रंग सजावटी रूप से धारण होगा । सिहाशन\, पिछवाई आदि में सफेद रंग सजाया जाएगा। \nवसंत पंचमी पर श्रृंगार सेवा में भगवान को सफेद छींट के  लाल किनारी वाले  वस्त्र धराए  जाएंगे । सादी सफेद खिड़की की पाघ . सादी मोर  चंद्रिका धराई जाएगी. आज से आभूषण सुवर्ण\, मीनाकारी माणिक के धरे जाएंगे । वसंत पंचमी से 40 दिनों तक चिबुक नहीं धरे जाएंगे. और दोहरी गुंजामाला. यानी 2 गुंजा  माला धरी जाएगी . इस दिन से प्रभु छोगा छड़ी धरी जाएगी. आज से प्रभु को जरी के वस्त्र नहीं धरे जाएंगे | \nसामग्री के क्रम में खजूर और फगुआ मावा। साथ ही लीला मेवा  और सूखे मेवे का भोग लगाया जाएगा |  नाथद्वारा में आज  2 राजभोग धरे जाएंगे. जिससे आज के दिन ९ समा के दर्शन होंगे. प्रथम राजभोग के बाद वसंत कलश जो प्रेम की आराधना का प्रतीक है।  राधाजी प्रभुकी सेवा में\, वसंत के आगमन के प्रतीक के रूप में\, कलश में जल भरा जाता है और कलश मे  आम के पेड़ के पत्तों\, खजूर की शाखाओं\, सरसों के पीले फूलों\, आम्र मंजरी शाखाओं सहित अन्य फूलों से सजाया जाता है। और कलश अधिवासन होता है | जिसके  नाथद्वारा सेवा क्रम में दर्शन किए जा सकते  है। \nद्वितीय राजभोग के पश्चात प्रभु खेल खिलाए जाएंगे | \nआज से 40 दिनों तक 4 यूथ  (निर्गुण\, तमस\, रजस\, सात्विक) के भक्तों द्वारा भगवान को केसर\, चोवा\, चंदन\, अबीर\, गुलाल आदि से खेल खेलाए जाते है। सखा भाव से सेवा भाव के कारण प्रभु  के श्रीचरणों को सफेद वस्त्र से ढका जाता है। पहले 10 दिनों में हल्का  खेल खेला जाता है। जिसमें चोवा\, अबीर\, चंदन\, केसर की बिंदी अनामिका उंगली से लेकर वस्त्र पर लगाई जाती है | खंडपाट\, पिछवाई मे खेल खिलाए जाते है | धीरे-धीरे खेल की मात्रा बढ़ती जाती है\, धमार के अंतिम 10 दिनों में अधिक भारी खेल आता है। \nआज से कुंज एकादशी तक राजभोग खेल में श्री गुसाइजी की अष्टपदी गाई जाती है। \nसेवा क्रम :\nवसंत पंचमी श्रीनाथजी सेवा क्रम \nडेली मंडे\, बन्दर वाल बंधे।जमनाजल की झारीजी आवे।थाली की आरती ।गेंद चौगान \,दिवला चाँदी के।अभ्यंग होवे।खंड\,पाट सब साज चाँदी को आवे\,डोल तक रहे।आज से शयन के दर्शन बाहर खुलने प्रारंभ हो जाएंगे | \nवस्त्र:- घेरदार बागा\,चोली\,सुथन\,सब स्वेत\,अड़तू के आवे।पटका मोठड़ा को\,पाग स्वेत\,स्याम खिड़की की।ठाड़े वस्त्र लाल।पिछवाई स्वेत मलमल की।आज सो छोगा छड़ी नित्य आवे। \nआभरण:- सब फागुन के।सोना\,माणक\, मीना के मिलमा।श्रृंगार छेड़ान से दो आगुल नीचे।सिरपेच की जगह \,पट्टी दर जडाऊ कटिपेच आवे।श्रीमस्तक पे एक मोर चन्द्रिका।वेणु वेत्र सोना के बटदार।आरसी दोनों समय बड़ी डाँड़ी की।40 दिन गुंज्जा माला दोहरा आवे।पट चीड़ को\,गोटी चाँदी की। \nनाथद्वारा में आज  2 राजभोग धरे जाएंगे. जिससे आज के दिन ९ समा के दर्शन होंगे. प्रथम राजभोग के बाद वसंत कलश जो प्रेम की आराधना का प्रतीक है।  कलश अधिवासन होगा |  राजभोग में बीच के चौका पे बसंत को हांडा आवे। \nश्री को चन्दन\,गुलाल\,अबीर\,चोवा से खिलावे।फिर ठाड़े वस्त्र\,पिछवाई\, बसंत\,चंदवा को खिलावे।अबीर\, गुलाल उड़े।फिर दूध घर\,शाग घर\,बालभोग के उत्सव भोग आवे।तुलसी\,शंखोदक\,धुप दिप होवे तत्पश्चात दर्शन खुले।आरती में पुष्प उड़े। \nगोपी वल्लभ मैवा बाटी\,फिका में चालनी\,वारा बड़े सेव के नग।रसोई में मीठी सेव\,केसरी पेठाआदी अरोगे। सायं आरती पीछे सब श्रृंगार बड़े होवे।लूम तुर्रा सुनहरी धरावे।शयन के दर्शन खुले।। \nमंगला – मोहन सों मन मान्यो \nश्रृंगार – माई री आज और काल और  \nराजभोग (खेल) – ब्रज युवती शत संगे \nराजभोग – गावत चली बसंत बधावन  \nआरती – देखत बसंत समे ब्रज सुंदर  \nशयन – गोवर्धन की शिखर चारु \nSeva kram  courtesy: Shrinathji Temple Nathdwara Management | \nVasant Nitya Seva Kirtan
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DESCRIPTION:श्री मुकुन्दरायजी को पाटोत्सवः । श्री मुकुंदराईजी की लीला भावना\, स्वरूप भावना\, इतिहास जानने के लिए हमारे गध्य साहित्य के निधि स्वरूप नामक ई-बुक को पढे |  Nidhi Swaroops
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SUMMARY:पोष कृष्णपक्ष 11
DESCRIPTION:षट्तिला एकादशी व्रतम्। मकर संक्रान्तिः। तिलवा उत्थापन अथवा भोग में ता पीछे दान श्राद्धादि करने। अबके यह संक्रान्ति आज दिन के ३ बजके ७ मिनिट पर बैठे है। तासूं पुण्यकाल आज दिन के ३ बजके ७ मिनिट सूं लेके सूर्यास्त पर्यन्त है। तामे भी संक्रान्ति के पास के २ घंटा अति मुख्य पुण्यकाल है। उत्तरायण। धनुर्मास की समाप्ति। \nआज उत्तरायण पर्व (मकर-संक्रांति) है. भारतीय तिथियों का आकलन चंद्रमा की कलाओं के आधार पर किया जाता है और सामान्यतया अधिकतर त्यौहार चन्द्र तिथियों के आधार पर ही मनाये जाते हैं परन्तु यह त्यौहार सूर्य के विभिन्न राशियों पर संक्रमण के आधार पर मनाया जाता है अतः सामान्यतया अंग्रेज़ी वर्ष की 14 अथवा 15 जनवरी को मनाया जाता है. \nप्राचीन ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रतिमाह सूर्य का निरयण राशी परिवर्तन संक्रांति कहलाता है.\nइसके अनुसार सूर्यदेव आज मकर राशि में प्रवेश एवं दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर प्रस्थान करते हैं. प्रतिमाह संक्रांति अलग-अलग वाहनों में\, वस्त्र धारण कर\, शस्त्र\, भोज्य पदार्थ एवं अन्य पदार्थों के साथ आती है. \nयद्यपि सूर्य की 12 संक्रांतियां है परन्तु इनमें से चार (मेष\, कर्क\, तुला एवं मकर) संक्रांति महत्वपूर्ण है.  \nभारत में सामान्य लोग केवल मकर-संक्रांति के विषय में जानते हैं क्योंकि इस दिन दान-पुण्य किया जाता है परन्तु ‘पुष्टिमार्ग’ में भी दो (मेष एवं मकर) संक्रांति को मान्यता दी गयी है.\nमकर-संक्रांति 14-15 जनवरी एवं मेष-संक्रांति 14 अप्रेल को मनायी जाती है. \nगद्दल भीतर छीट का  व बाहर केसरी साटन का  \nकीर्तन –मंगला दर्शन (राग : विभास) \nतरणी तनया तीर आवत है प्रातसमें गेंद खेलत देख्योरी आनंदको कंदवा \nश्रीजी का सेवाक्रम –\nपर्व रुपी उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को पूजन कर हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.\nसभी समय झारीजी में यमुनाजल भरा जाता है. रजाई व गद्दल छींट की आती है. दिन में दो समाँ में आरती थाली में की जाती है. \nमंगला दर्शन पश्चात प्रभु को चन्दन\, आवंला\, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है. \nमलार मठा खींच को लोंदा।\nजेवत नंद अरु जसुमति प्यारो जिमावत निरखत कोदा॥\nमाखन वरा छाछ के लीजे खीचरी मिलाय संग भोजन कीजे॥\nसखन सहित मिल जावो वन को पाछे खेल गेंद की कीजे॥\nसूरदास अचवन बीरी ले पाछे खेलन को चित दीजे॥ \nउत्तरायण पर्व मकर-संक्रांति \nश्रीजी में आज रेशमी छींट के वस्त्र धराये जाते हैं.\nप्रभु के समक्ष नयी गेंदे धरी जाती है. सभी समां में गेंद खेलने के पद गाये जाते हैं. \nश्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में कट-पूवा अरोगाये जाते हैं. \nराजभोग में अनसखड़ी में नियम से दाख (किशमिश) का रायता व सखड़ी में केसरी पेठा\, मीठी सेव\, विशेष रूप से सिद्ध सात धान्य का खींच व मूंग की द्वादशी अरोगायी जाती है. इसके साथ प्रभु को आज गेहूं का मीठा खींच भी अरोगाया जाता है. \nइस अवधि में गोपीवल्लभ (ग्वाल) समय श्रीजी को तिलवा व उत्सव भोग धरे जाएंगे. इसी समयावधि में वैष्णव भी अपने सेव्य स्वरूपों को तिलवा के भोग घर सकते हैं. \nउत्सव भोग में श्रीजी को तिलवा के गोद के बड़े लड्डू\, श्री नवनीतप्रियाजी\, श्री विट्ठलनाथजी एवं श्री द्वारकाधीश प्रभु के घर से आये तिलवा के लड्डू\, दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांड़ी\, विविध प्रकार के संदाना (आचार) के बटेरा एवं तले हुए बीज-चालनी के नमकीन सूखे मेवे का भोग अरोगाया जाता है.\nमकर संक्रांति में श्रीजी के कीर्तन – \nश्रृंगार दर्शन – (राग-धनाश्री) \nतरणी तनया तीर आवत है प्रातसमें गेंद खेलत देख्योरी आनंदको कंदवा l\nकाछिनी किंकिणी कटि पीतांबर कस बांधे लाल उपरेना शिर मोरनके चंदवा ll \nआरती दर्शन -(राग-नट) \nतुम मेरी मोतीन लर क्यों तोरी ।\nरहो रहो ढोटा नंदमहरके करन कहत कहा जोरी ।।१।।\nमें जान्यो मेरी गेंद चुराई ले कंचुकी बीच होरी ।\nपरमानंद मुस्काय चली तब पूरन चंद चकोरी ।।२।। \nशयन – (राग-धनाश्री)  \nग्वालिन तें मेरी गेंद चुराई l\nखेलत आन परी पलका पर अंगिया मांझ दुराई ll 1 ll\nभुज पकरत मेरी अंगिया टटोवत छुवत छतियाँ पराई l\n‘सूरदास’ मोहि यहि अचंभो एक गयी द्वै पाई ll 2 ll \nराजभोग दर्शन – \nसाज – आज श्रीजी में बड़े बूटों वाली लाल रंग की छींट की केरी भात की पिछवाई धरायी जाती है जो कि रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित है. गादी\, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है एवं प्रभु के स्वरुप के सम्मुख लाल रंग की तेह बिछाई जाती है. \nवस्त्र – आज श्रीजी को लाल रंग की छींट का रुई भरा सूथन\, चोली\, घेरदार वागा एवं मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र श्वेत लट्ठे के धराये जाते हैं. \nश्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) चार माला का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. हीरा\, मोती के सर्व आभरण धराये जाते हैं.\n श्रीमस्तक पर लाल रंग की छींट की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच\, लूम\, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं.\nश्रीकंठ में त्रवल नहीं आवे व कंठी धरायी जाती है. सफ़ेद एवं पीले पुष्पों की चार कलात्मक मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में स्वर्ण के वेणुजी एवं एक वेत्रजी (विट्ठलेशरायजी के) धराये जाते हैं.\nपट लाल एवं गोटी स्याम मीना की आती हैं.\nआरसी श्रृंगार में सोना की दिखाई जाती हैं.  \nआज शयनभोग में प्रभु को शाकघर में सिद्ध सूखे मेवे का अद्भुत खींच भी अरोगाया जाता है जो कि वर्षभर में केवल आज के दिन ही अरोगाया जाता है. \nSource : Shrinathji Temple Management\n       : facebook page : Shreenathji Nity darshan \nगेंद खेलवे के पद :\nराग : धनाश्रि  \nग्वालिन तें मेरी गेंदचुराई ॥\nखेलत आन परी पलकापर अंगियां मांझ दुराई ॥१ ॥\nभुज पकरत मेरी अंगियां टटोवत छूवत छतियां पराई ॥\nसूरदास मोहि येही अचंबो एक गई द्वयपाई ॥२ ॥ \nपतंग के पद :\nराग : कान्हरो \nउड़ी उडावन लागे लाल ॥\nसुंदर पथक बांध मनमोहन बाजत मोरनके ताल ॥१॥\nकाऊ पकरत कोऊ एंचत कोऊ देखत नैन विशाल ॥\nकोऊ न कोऊ करत कुलाहल कोऊ बजत बोहो करताल॥२॥\nकोऊ गुड गुडीसों रिझ आपुन खेंचत डोर रसाल ॥\n‘परमानंद’ स्वामी मनमोहन रीझ रहत एक ही ततकाल ॥३॥ \nभोजन के पद :\nराग : आसावरी\nमात जसोदा परव मनावे ॥\nभोगीके दिन तिल लडुवा ले लाडिले लालनकोंजु जिमावे ॥१ ॥\nगोद बेठाय निहारत सुत मुख नानाविध के दान दिवावे ॥\nकुंभनदास प्रभु गोवरधन घर निरख निरख सबही सुख पावे ॥ २ ॥
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