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SUMMARY:श्रावण कृष्णपक्ष 7
DESCRIPTION:शयन में षष्ठी  को उत्सव | विष्णुस्वामि प्राकट्योत्सव |  तीन समय थाली की आरती उतरे | गेंद चौगान\, दिवाला सोने के | सभी समय जमना जल की झारीजी आवे | तकिया जड़ाऊ |\nवस्त्र : पिछोड़ा लाल डोरिया को\, रूपहरी किनारी को | श्री मस्तक पे छज्जेदार पाग | ठाड़े वस्त्र पीले | पिछवाई पिली मलमल कि |\nआभरण : सब हीरा के | छेडान को शृंगार | त्रवल नहीं आवे\, हीरा कि बद्धि धरावे | श्री मस्तक पे सादा मोर चंद्रिका | पट उत्सव को\, गोटी जड़ाऊ | आरसी लाल मखमल की |\nविशेष मे आज शयन भोग के संग षष्टि उत्सव को भोग आवे | भोग मे फेनी को थाल\, बासोंदि\, फीके खाजा\, पतली पूड़ी\, केरी को मुरब्बा\, सोंठ आदि सामग्री आरोगे | गोपीवल्लभ मे घेवर\, फीका मे चालनी अरोगे |
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SUMMARY:श्रावण कृष्णपक्ष 3
DESCRIPTION:कज्जली तीज
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SUMMARY:श्रावण कृष्णपक्ष 2
DESCRIPTION:हिंदोला विजय सायं संध्या मे
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SUMMARY:श्रावण कृष्णपक्ष 1
DESCRIPTION:हेम – हिन्दोला
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SUMMARY:श्रावण शुक्लपक्ष 15
DESCRIPTION:रक्षाबंधनं  – प्रातः शृंगार मे  |  \nप्रभु श्रीनाथजी को  पवित्रा की भांति ही रक्षा (राखी) भी शुभमुहूर्त से धराई जाती है | कभी प्रातः काल श्रृंगार दर्शन में और कभी उत्थापन दर्शन में धरायी जाती है | पुष्टिमार्ग में सूर्योदय के समय की तिथि से त्यौहार मनाया जाता है | व भद्रा रहित काल में श्री ठाकुरजी को रक्षा धरायी जाती है | \nसभी वैष्णव अपने सेव्य ठाकुरजी को शृंगार दर्शन के पश्चात रक्षा (राखी) धरा सकते हैं | एवं टिप्पणी मे अन्यथा आप हमारे तिथि पत्र मे उत्सव के दिन तिथि पर टच करके मुहूर्त समय जान शकते है | वह मुहूर्त अनुसार प्रभु को राखी धरी जाती है | \nसभी वैष्णव प्रभु को शृंगार मे सेव्य ठाकुरजी को रक्षा सूत्र (राखी) धरने के पश्चात अपनी बहनों से राखी बंधाते है  |  \nसेवा क्रम :  \nसभी द्वार में हल्दी से डेली मंढे\,बंदरवाल बंधे।सभी समय जमना जल की झारीजी आवे।चारो समय थाली की आरती उतरे। अभ्यंग। आज से नवमी तक आगे की सफेदी नहीं चढ़े।तकिया लाल मखमल के। \nसाज :- श्रीजी में आज लाल रंग की मलमल पर रुपहली ज़री के हांशिया (किनारी) वाली पिछवाई धरायी जाती है | गादी के ऊपर सफेद और तकिया के ऊपर लाल मखमल बिछावट की जाती है | तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है | पीठिका और पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा धराये जाते है | \nवस्त्र:- पिछोड़ा लाल\,रूपहरी पठानी किनारी को।श्रीमस्तक पे छज्जेदार पाग\,चिल्ला वाली।ठाड़े वस्त्र पिले।पिछवाई वस्त्र जैसी लाल। \nआभरण:- सब उत्सव के\,हीरा की प्रधानता।मध्य से दो आगुल उचो श्रृंगार।हीरा\, पन्ना\,मानक मोती के हार\,माला\,दुलड़ा धरावे। श्रीकर्ण में कर्ण फूल दो जोड़ी।कली की माला आवे।श्रीमस्तक पे मोर चन्द्रिका आवे।वेणु वेत्र तीनो हीरा के।पट उत्सव को\,गोटी जड़ाऊ।आरसी चार झाड़ की। \nराखी धरावे।झालर\,घंटा\,शंख बजे।प्रभु के तिलक अक्षत करके राखी धरावे।फिर सभी स्वरूप के राखी धरावे। \nविशेष:- दुधघर की हाँड़ी\,गुलपापड़ी\,कतला\, कच्चर\,चालनी आवे।गोपिवल्लभ में जलेबी।फीका में चालनी\,केसरी पेठा\,मीठी सेवादी। \nसायं कांच के हिंडोलाना में झूले। \nअनोसर में अत्तर दान\,मिठाई को थाल\,चोपड़ा\,चार बीड़ा\,आरसी आदी आवे। \nमंगला – सोहेलरा नंद महर घर आज \nराजभोग – ऐ री ऐ आज नंदराय  \nहिंडोरा – सावन की पून्यो मन भवन\, सुघर रावरे की गोप कुँवर\,  मन मोहन रंग बोरे झूलन आइ \, रशे ज़ू झुलत रमक-झमक शयन – श्रावण सुन सजनी बाजे मंदिलरा \nमान – गृह आवत गोपीजन \nराखी धरावे- बहन सुभद्रा राखी बाँधत \nरक्षा बंधन के पद :\nराग : वृंदावनी  सारंग \nबहेन सुभद्रा राखी बांधत बल अरु श्री गोपाल के।\nकनकथार अक्षतभर कुंकुंम तिलक करत नंदलाल के।।१।।\nआरती करत देत न्योछावर वारत मुक्ता मालके।\nआसकरण प्रभु मोहन नागर प्रेम पुंज व्रजलालके ।।२।। \nराग : सारंग \nराखी बांधत यशोदा मैया ॥\nबहु शृंगार सजे आभूषण गिरिधर भैया ॥१ ॥\nरत्नखचित राखी बांधि कर पुनपुन त बलैया ॥\nसकल भोग आगें धर राखे तनकजु लेहु कन्हैया ॥२ ॥\nयह छबि देख मग्न नंदरानी निरख निरख सचुपैया ॥\nजीयो यशोदा पूत तिहारो परमानंद बलजैया ॥ ३ ॥
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SUMMARY:श्रावण शुक्लपक्ष 14
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SUMMARY:श्रावण शुक्लपक्ष 12
DESCRIPTION:पवित्रा बारस | गुरुओं को पवित्रा परावने ।
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SUMMARY:श्रावण शुक्लपक्ष 11
DESCRIPTION:पुत्रदा एकादशी व्रतम्। पवित्रारोपणं सायं उत्थापन  में | पवित्रा एकादशी   व्रज – श्रावण शुक्ल एकादशी \nपवित्रा पहेरत राजकुमार ।\nतीन्यो लोक पवित्र कीये है श्रीविट्ठल गिरिधार ।।१।।\nआती ही पवित्र प्रिया बहु विलसत निरख मगन भयों मार ।\nपरमानंद पवित्रा की माला गोकुल की ब्रजनार ।।२।। \nपुत्रदा एकादशी (पवित्रा एकादशी) \nआज प्रभु को नियम का सफेद मलमल का केशर की कोर का पिछोड़ा और श्रीमस्तक पर श्वेत मलमल की सुनहरी किनारी की कुल्हे के ऊपर तीन मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ धरायी जाती है.\nआज से पूनम तक प्रतिदिन श्रृंगार समय मिश्री की गोल डली का भोग अरोगाया जाता है. \nगोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से श्रीजी को मनमनोहर (केशर-इलायची बूंदी)\, मेवाबाटी (सूखे मेवे से भरा खस्ता ठोड़) एवं दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.\nराजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता\, सखड़ी में मीठी सेव व केशरयुक्त पेठा दोहरा अरोगाये जाते हैं. \nआज शृंगार के समय पवित्रा का अधिवासन होगा\, धूप\, दीप\, शंखोदक किये जाएंगे और कुछ समय उपरांत पंखे का टेरा लेकर श्रीजी को पवित्रा धराये जायेंगे. \nपवित्रा धराये उपरांत उत्सव भोग धरे जायेंगे जिसमें विशेष रूप से मिश्री की गोल डलियाँ (सफ़ेद व केसरयुक्त)\, छुट्टी बूंदी\, खस्ता शक्करपारा\, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी\, दूधपूड़ी (मलाई-पूड़ी)\, केशर-युक्त बासोंदी\, जीरा-युक्त दही\, घी में तला बीज-चालनी के सूखे मेवे\, विविध प्रकार के संदाना (आचार)\, विविध प्रकार के फलफूल\, शीतल आदि अरोगाये जाते हैं.\nआज प्रभु को उत्सव भोग में सभी गृहों से पधारी मिश्री भी अरोगायी जाती है. \nभोग समय फीका के स्थान पर घी में तला बीज-चालनी का सूखा मेवा आरोगाया जाता है. \nश्रावण शुक्ल एकादशी की मध्यरात्रि को स्वयं ठाकुरजी ने प्रकट होकर श्री महाप्रभु जी को दैवीजीवों को ब्रह्म सम्बन्ध देने की आज्ञा दी.\nइस प्रकार श्रावण शुक्ल द्वादशी के दिन श्रीवल्लभ ने सब से प्रथम ब्रह्म-सम्बन्ध वैष्णव दामोदर दासजी हरसानी को दिया.\nतब से आज का दिन सभी वैष्णवों में पुष्टिमार्ग की स्थापना दिवस-समर्पण दिवस के रूप में मनाया जाता है.\nपुष्टिमार्ग में गुरु का पूजन कल अर्थात श्रावण शुक्ल द्वादशी को किया जाता है.\nकल के दिन श्री ठाकुरजी को पवित्रा धराये पश्चात अपने ब्रह्म-सम्बन्ध देने वाले गुरु को पवित्रा\, यथाशक्ति भेंट आदि धरें एवं दंडवत करें इसके पश्चात वैष्णवों को परस्पर पवित्रा धर के ‘जय श्री कृष्ण’ कहें. परस्पर प्रसादी मिश्री का प्रसाद लेवें.\nश्री महाप्रभुजी को स्वयं श्रीजी ने ब्रह्म सम्बन्ध देने की आज्ञा प्रदान की इस कारण सभी वैष्णवों को श्री वल्लभ कुल के बालकों से ही ब्रह्म सम्बन्ध लेना चाहिए\, किसी अन्य साधु-संत आदि से नहीं लिया जाना चाहिए.\nश्री वल्लभ कुल के बालक श्री महाप्रभुजी की ओर से ब्रह्म सम्बन्ध देते हैं. पुष्टिमार्ग के गुरु श्री महाप्रभुजी हैं. \nराजभोग दर्शन – \nसाज – श्रीजी में आज सफेद डोरिया के वस्त्र पर धोरे (थोड़े-थोड़े अंतर से सुनहरी ज़री के धोरा वाली)\, सुनहरी ज़री की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है.\nगादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है. \nचित्र में पीठिका के ऊपर व इसी प्रकार से पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा द्रश्य है. \nवस्त्र – श्रीजी को आज सफेद केसर की किनारी का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के होते हैं. \nश्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला का (चरणारविन्द से दो अंगुल ऊंचा) उत्सव का भारी श्रृंगार धराया जाता है.\nमिलवा हीरे की प्रधानता के मोती\, माणक\, पन्ना एवं जड़ाव स्वर्ण के आभरण धराये जाते हैं.\nश्रीमस्तक पर सफेद कुल्हे के ऊपर सिरपैंच\, तीन मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.\nश्रीकर्ण में हीरे के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. चित्र में रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में द्रश्य हैं.\nनीचे पाँच पदक ऊपर हीरा\, पन्ना\, माणक\, मोती के हार व दुलडा धराया जाता हैं.कली की मालाजी धरायी जाती है.\nश्रीहस्त में कमलछड़ी\, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.\nपट उत्सव का\, गोटी सोने की जाली की आती है.\nआरसी शृंगार में चार झाड़ की एवं राजभोग में सोना की डांडी की आती हैं. \nश्रीजी को शुभमुहूर्त से पवित्रा कभी प्रातः श्रृंगार दर्शन में और कभी उत्थापन दर्शन में धराये जाते हैं. \n360 तार के सूत्र का पवित्रा\, सादा रेशमी पवित्रा\, फोंदना वाला रेशमी पवित्रा\, रुपहली और सुनहरी तार वाला पवित्रा आदि अनेक प्रकार के पवित्रा श्री ठाकुरजी को धराये जाते हैं. पवित्रा धराये उपरान्त प्रभु को यथाशक्ति भेंट अवश्य धरी जाती है और उत्सव भोग अरोगाया जाता है.\nप्रभु को पवित्रा धराये पश्चात पिछवाई और पीठिका के ऊपर भी पवित्रा धराये जाते हैं. \nसभी वैष्णवों को भी अपने घर के सेव्य ठाकुर जी को पवित्रा धरने चाहिए. \nवैष्णव अपने घर में ठाकुरजी सेवा हो वे शृंगार में ( श्रीजी को धराने के उपरांत ) अपने सेव्य ठाकुरजी को पवित्रा धरा सकते हैं. \nपवित्रा एकादशी से रक्षाबंधन तक पांच दिन श्रृंगार पश्चात् पवित्रा धराये जाते हैं. किसी कारणवश इन पांच दिवस में पवित्रा नहीं धरे जाएँ तो जन्माष्टमी तक पवित्रा धराये जा सकते हैं और यदि जन्माष्टमी तक भी पवित्रा नहीं धराये जा सकें तो देव प्रबोधिनी तक भी धराये जाने का सदाचार है परन्तु सभी वैष्णवों को अपने ठाकुरजी को पवित्रा धरना अवश्य ही चाहिए अन्यथा सारे वर्ष की सेवा सफल नहीं मानी जाती है. \nपवित्रा धराये पश्चात् आज से जन्माष्टमी की नौबत (एक प्रकार का वाध्य) की बधाई बैठती है. \nइसका कारण यह है कि जगद्गुरु श्रीमद् वल्लभाचार्य जी ने दैवीजीवों के उद्धार हेतु आज के दिन ही डंका बजा कर घोषणा की थी. \nश्रीजी का सेवाक्रम –  \nमंगला के पश्चात ठाकुरजी को चन्दन\, आवंला\, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है. \nउपरना श्वेत मलमल का \nकीर्तन –मंगला दर्शन (राग : मल्हार ) \nआज बड़ो दरबार देख्यो नंदराय तेरो\, भयो सुख सबै भाँति दुख गयो मेरो \n“या कृता वार्षिकी सेवा सा मूल फलदामता |\nप्रत्यहं सूत्ररूपेण सैकीभूतानुभावनात् |” \nश्रीगोपीनाथ प्रभुचरण के अनुसार उक्त पवित्रा का भाव यह है कि यह पवित्रा वैष्णवों द्वारा की गयी वर्षभर की सेवा का प्रतीक है इस लिए यह 360 तारों का होता है.\nइस पवित्रा के 360 सूत के सूत्र एक वर्ष के अन्तर्गत 360 दिनों के प्रतीक है जो मानसी सेवा जैसे मूल फल को देने वाला है. \nशास्त्र आज्ञा करते हैं –\n“न करोति विधानेन पवित्रारोपणं तु यः |\nतस्य सांवत्सरी पूजा निष्फला मुनि सत्तम |” \nअर्थात : हे मुनि श्रेष्ठ. जो मनुष्य विधान पूर्वक (श्री प्रभु को) पवित्रा नहीं धराता है तो उसकी वार्षिकी सेवा निष्फल हो जाती है. \nपवित्रा बनाने के जो विधान शास्त्र में कहे गए हैं उसमें भी अनेक मत हैं. तीन सौ साठ तारों का पवित्रा उत्तम है\, दो सौ सत्तर तारों पवित्रा मध्यम है और एक सौ अस्सी तारों का पवित्रा कनिष्ठ है. \nकुछ आचार्य पवित्रा में लगायी जाने वाली गाँठों के विषय में उत्तम\, मध्यम और कनिष्ठ का प्रकार बतातें हैं जिनमें 24\, 12 व 8 गाँठें क्रमशः उत्तम\, मध्यम\, कनिष्ठ मानी गयी हैं. \nहमारे प्रभु तो उत्तम वस्तु के ही भोक्ता हैं अतः उन्हें उत्तम पवित्रा ही धरायें. \nपवित्रा का उत्तम होने के साथ शोभायमान होना भी अत्यावश्यक है.\nउसकी ग्रंथियाँ सुन्दर लम्बी गोलाई वाली हों जो प्रभु को चुभें नहीं. पवित्रा सुन्दर उत्तम और सुगन्धित केसर से रंगा होना चाहिए. \nSource : Shrinathji Temple Management\n       : facebook page : Shreenathji Nity darshan
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DESCRIPTION:नाग पंचमी | श्रीनाथजी की ऊर्ध्व भुजा दर्शन |  \nसेवा क्रम :  \nसाज – आज श्रीजी में श्री गिरिराजजी की एक ओर आन्योर ग्राम एवं दूसरी ओर जतीपुरा ग्राम | दोनों ग्रामों से व्रजवासी श्रीजी की उर्ध्व भुजा के दर्शन करने जा रहे हैं | ऐसे सुन्दर चित्रांकन से सुशोभित पिछवाई धरायी जाती है | \nगादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है | \nवस्त्र:- पिछोड़ा कोयली\,सुनहरी पठानी किनारी को।श्रीमस्तक पे कोयली छज्जेदार पाग\,सुनहरी जरी की बाहर की खिड़की की।ठाड़े वस्त्र लाल।पिछवाई चितराम की उर्धभुजा प्राकट्य की। \nआभरण:- सब मोती के।मध्य को श्रृंगार।चार कर्ण फूल आवे।त्रवल नहीं आवे\,बध्धी धरावे।श्रीमस्तक पे जमाव को क़तरा\,डाँख को व लूम\,तुर्री सुनहरी।कली की माला धरावे।वेणु वेत्र स्याम मीना के।पट कोयली\,गोटी चाँदी की। \nअनोसर में पाग पे से सुनहरी खिड़की बड़ी करके धरानी। \nविशेष में सेव की खीर अरोगे। \nमंगला – बोले माई गोवर्धन पर मूरवा \nराजभोग – देखो अद्भुत अवगत की गत  \nहिंडोरा – झुलत है राधा सुंदर\, झुलत लाल गोवर्धनधारी\, गृह-गृह ते आई व्रज सुंदर\, झुलत रंग हिंडोरे सुंदर  \nशयन – माई री झूलत रंग हिंडोरे \nSeva kram  courtesy: Shrinathji Temple Nathdwara Management | \nनाग पंचमी हिंडोला के पद : \nराग  : काफी \nनीलांबर पहेर तन गोरें झूलत सुरंग हिंडोरें ॥\nमनि मानिक हीरा रतन मुक्ताफल शोभितहे तन गोरें ॥१ ॥\nसुद तिथी नागपंचमी दिन दयाल दरस दीवो जोरें ॥\nजन्म दिवस जान बलदाऊ को मदन मोहन कृपा करी अतोरें ॥ २ ॥\nझुलत रंग बढ्योजु परस्पर झुलावन मिले आय चहुं ओरें ॥\nहरिदास प्रभुकी यह शोभा चीत चोर्यो इन नयनकी कोरें ॥३ ॥
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SUMMARY:श्रावण शुक्लपक्ष 3
DESCRIPTION:ठकुरानी तीज मधुस्रवा । \nउत्सव से जुड़े प्रसंग को जानने हेतु हमारे अध्ययन शेकशन के वर्षोत्सव सेक्शन मे जाए | \nसेवा क्रम :  \nसभी द्वार में हल्दी से डेली मंढे\,बंदरवाल बंधे। जमना जल की झारीजी ।चारो समय थाली की आरती उतरे।गेंद चौगान\,दिवला सोना के।मंगला के दर्शन पीछे प्रभु के अभ्यंग होवे। \nसाज – श्रीजी में आज लाल रंग की चौफूली चूंदड़ी की रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है | गादी\, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है | तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है | \nवस्त्र:- पिछोड़ा व छज्जेदार पाग लाल चोफुली चुंदड़ी के।चुंदड़ी के वस्त्र आज से ही आरम्भ होवे।ठाड़े वस्त्र पिले।पिछवाई चितराम की। \nआभरण:-सब उत्सव के\,हीरा के।बनमाला को श्रृंगार।हीरा\, पन्ना\,मानक मोती के हार\,माला\,दुलड़ा धरावे।कस्तूरी\,कली आदी सब माला आवे।कर्ण फूल चार हीरा के।श्रीमस्तक पे एक मोर चन्द्रिका।वेणु वेत्र तीनो हीरा के।पट उत्सव को\,गोटी जड़ाऊ।आरसी चार झाड़ की। \nविशेष में गोपी वल्लभ में चिरोंजी के बड़े नग। सकड़ी में केसरी पेठा\,मीठी सेव आदी अरोगे। \nसायं कलकती कांच के हिंडोलाना में झूले। \nमंगला : भींजत कब देखो इन नेना \nराजभोग- सारी मेरी भींजत है जु\,  \nहिंडौरा- सावन तीज सुहाग\, नयी ऋतु सावन तीज सुहाई\, सावन नीज किशोरी झुलत\, सावन तीज हिंडोरे झूलत  \nशयन-  प्यारे पिय के संग आज झूली \nSeva kram  courtesy: Shrinathji Temple Nathdwara Management |  \nठकुरानी तीज के पद\nराग सोरठ मल्हार \nदेख सखी तीज महातम आयो ||\nश्यामाश्याम परस्पर झूलत निरख परम सुख पायो ॥१ ॥\nदिशदिश घोरघोर घन गरजत मंदमंद वरखायो ।।\nदादुर मोर पपैया बोलत कोयल शब्द सुनायो ।।२ ।।\nताल मृदंग किन्नरी दुंदुभी प्रेम निसान बजायो ।।\nसूरदास प्रभु युगल विराजत अखिल भुवन यशछायो ॥३ ॥ \nसुर मल्हार \nआलीरी सावन तीज सुहाग\nदेखि बन धन हरित बेली होत है अनुराग || ध्रु. ||\n(तहा) लाडिली वृषभान तनया सजे सकल शृंगार | सुभग तन पचरंग चुनरी\, केसरी आड़ लिलार ||\nमिली खत-दस बरस की सखी बनी एक ही सार | चली बर हिंडोले जुलन\, राय के दरबार || 1 ||\nकुरंगनेनी चंद बदनी\, चलत मद गज चाल | बिहसी मधुरे बोल बोलत\, करत बहुबिधी ख्याल ||\nगावत सावन गीत प्रमुदित\, श्रवण सुनत रसाल | चतुर चपल द्रगंचनिसों\, मोह लिए नंदलाल || 2 ||\nजुलत नवलकिशोर दोउ\, बनी अद्भुत जोरी | देत झोंटा प्रेम रसभरी\, सहचरी चउओरी ||\nलाल गिरिधर रसभरे अती\, केली सिंधु झकोरी | कमललोचन बिहसी चितवत\, दास जनकी ओरी || 3 ||
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DESCRIPTION:सोमवती अमावस\, हरियाली अमावस |
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SUMMARY:अषाढ़ कृष्णपक्ष 11
DESCRIPTION:कामिका एकादशी व्रतम्।
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SUMMARY:अषाढ़ कृष्णपक्ष 10
DESCRIPTION:नाथद्वारा श्रीजी के मंदिर मे हांडी उत्सव
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SUMMARY:अषाढ़ कृष्णपक्ष 7
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