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DESCRIPTION:कार्तिक स्नानारम्भ
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SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 14
DESCRIPTION:शरद पूर्णिमा | रासोत्सव |\nसेवा क्रम :\nआश्विन शुक्ल पूर्णिमा को शरद का श्रृंगार श्वेत एवं सुनहरी ज़री के वस्त्र मुकुट एवं आभरण हीरा मोती के धराये जाते हैं | एवं स्वामिनीजी के भाव से शरद की सज्जा की जाती है | महारास के चित्रांकन की पिछवाई धरी जाती है | \nआज प्रभु को नियम का रास का चौथा मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जाता है | आज के वस्त्र श्रृंगार सर्व सखियों के अद्भुत भावों से धराये जाते हैं | \nमेघश्याम चोली यमुनाजी के भाव से\, ऊपर की रूपहरी ज़री की काछनी स्वामिनीजी के भाव से\, नीचे की सुनहरी ज़री की काछनी चन्द्रावलीजी के भाव से\, सूथन कुमारिकाजी के भाव से एवं लाल पीताम्बर (रास-पटका) अनुराग भावरूप ललिताजी के भाव से धराया जाता है | \nआज प्रभु को पीठिका पर रूपहरी ज़री का दत्तु ओढाया जाता है | \nसभी द्वार में हल्दी से डेली बनाई जाती है \,आसापाला के पत्तो की बन्दर वाल बांधी जाती है।चंदन \,आंवला\, फुलेल से अभ्यंग होव। \nसाज :- “द्वे द्वे गोपी बीच बीच माधौ” अर्थात दो गोपियों के बीच माधव श्री कृष्ण खड़े शरद-रास कर रहें हैं | ऐसी महारासलीला के अद्भुत चित्रांकन से सुसज्जित पिछवाई आज श्रीजी में धरायी जाती है | गादी\, तकिया और चरणचौकी पर सफेद लट्ठा की बिछावट की जाती है | \nवस्त्र:- छोटी काछनी व सुथन सुनहरी जरी की।बड़ी काछनी रूपहरी। चोली मेघ स्याम दरियाई(रेशम)की।पीताम्बर लाल दरियाई को।ठाड़े वस्त्र सफ़ेद डोरिया के ।पिछवाई चित्राम की महारास के भाव की। पीठक पे जरी को रूपहरी दत्तू ओढ़े। मंगला में स्वेत उपरना धरावे। आज चोटीजी नहीं आवे। गादी तकिया सब सफेद लट्ठा के। \nआभरण:- सब उत्सव के।हीरा की प्रधानता चोटिजी।मुकूट टोपी हीरा की।चोटी जी नहीं आवे।वेणु वेत्र हीरा के।। आरसी श्रृंगार में चार झाड़ की\, राजभोग में शरद की डाड़ी की। पट उत्सव को गोटी जड़ाऊ।हीरा को चौखटा आवे। \nसामग्री:- मानोर के नग को \,दूध घर की केसर यक्त बासोदि की हाडी। रसोई में केसर युक्त पेठा\, मीठी सेव\,स्याम खटाई\, कचहरिया आदि। \nविशेष:- आनोसर में सफेदी बिछे। बीच मे सांगामची पधरानी। पटिया पे आनोसर भोग आवे। भोग में फैनी\,गुजिया\,कचोरी\,दही बड़ा\,दूध घर को साज(बासोदि\,पेड़ा\, बर्फी\,खट्टे-मीठे दही\, दूध पूड़ी आदि)\,शाग घर की सामग्री\,सभी तरह के फल\, तले मेवा आदी। \nमंगला – मान लाग्यो गिरधर गावे \nराजभोग – बन्यो रास मण्डल \nआरती – वृंदावन अद्भुत नभ देखियन \nशयन – पूरी पुरन मासी\, श्याम सजनी शरद रजनी\, \nमण्डल मद रंग भरे\, लाल संग रास रंग\, \nबन्यो मोर मुकुट\, श्याम नवल नवल बधु\, \nनिर्तत रास रंगा\, खेलत रास रसिक नागर\, \nऐ रैन रीझी हो प्यारे\, बन्सी बट के निकट\, \nशरद सुहाई हो ज़ामिन\, राजत रंग भीनी \nऔर भी केदारो-बिहाग के पद गावे। मान व पोढवे के पद नहीं होवे । \nSeva kram courtesy: Shrinathji Temple Nathdwara Management | \nशरद पूर्णिमा के पद : https://vrajdwar.org/hi/adhyayan/padhya-sahitya/
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DESCRIPTION:श्री बालकृष्णजीको पाटोत्सव  | बालकृष्णजी की लीला भावना\, स्वरूप भावना\, इतिहास जानने के लिए हमारे गध्य साहित्य के निधि स्वरूप नामक ई-बुक को पढे |  Nidhi Swaroops
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DESCRIPTION:पाशांकुशा एकादशी व्रतम् ।
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SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 10
DESCRIPTION:दशहरा (विजयादशमी) । सरस्वती विसर्जनम् ।\nप्रथम विलास के दिन जो माटी के १० मिट्टी के बर्तन मे बीज रोपण होता है | १० दिन तक यह बीज की वृद्धि होती है जो हमारे भाव की वृद्धि के भाव से है | इन नों दिनों मे हुई अंकुर की वृद्धि नवधाभक्ति मे वृद्धि के भाव से है | जव का चिन्ह श्री स्वामीनिजी के श्री चरण मे है जो नवधा भक्ति का सुचन करता है | नों दिनों मे हुए अंकुर की वृद्धि को लाल धागे (जो प्रेम लक्षणा भक्ति के भाव से है)से बांध कर (अर्थात नवधा भक्ति मे से ही प्रेम लक्षणा भक्ति प्राप्त की जा शक्ति है) प्रभु को धराए जाते है | प्रभु हमारे इस भाव को सहर्ष आपके श्री मस्तक पर धारण करते है |\nयह १० वर्तन १० गुण के भक्त के भाव से होते है | जो सात्विक\, राजस\, तामस से ९ गुण बनते है और १ निर्गुण इस तरह १० गुण के भक्तों के भाव से होते है |\nनव विलास \, दशहरा\, शरद पूर्णिमा के पद : https://vrajdwar.org/hi/adhyayan/padhya-sahitya/\nसेवा क्रम :\nआज दशहरा शुभ दिन नीको । विजयदशमी(दशहरा)\, \nमंगला दर्शन \nआज असत्य पर सत्य की विजय का पर्व विजयदशमी (दशहरा) है. \nश्रीजी का सेवाक्रम – पर्व रुपी उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं. \nपूरे दिन सभी समय झारीजी में यमुनाजल भरा जाता है.\nचारों समय (मंगला\, राजभोग\, संध्या व शयन) की आरती थाली में की जाती है. ऊष्णकाल में प्रभु की आरती में आरती के एक खण्ड में ही बाती लगायी जाती थी. विजयदशमी के दिन से शीत का अनुभव होने से आरती के सभी तीन खण्डों में बाती सजाई जाती है.\nगेंद\, चौगान व दीवाला सोने के आते हैं. \nउपरना रूपहरी ज़री का \nकीर्तन –मंगला दर्शन (राग : बिलावल) \nसात वरसको सांवरो बोलत है तुतरात \nआज से ही प्रतिदिन खिड़क से गौमाता पधारें इस भाव से प्रभु के सम्मुख काष्ट (लकड़ी) की गाय पधरायी जाती है. \nहल्की ठण्ड आरम्भ हो गयी है अतः आज से मंगला समय प्रभु स्वरुप की पीठिका पर दत्तु ओढाया जाता है. \nइससे श्रीजी में यह परंपरा है कि आज से एक माह तक समस्त पुष्टि-सृष्टि के वैष्णवों की ओर से सभी जीवों के कृतार्थ हेतु मंगला दर्शन उपरांत श्रीजी के श्रीचरणों में प्रतिदिन सवा लाख (1\,25\,000) तुलसी दल (पत्र) समर्पित किये जाते हैं. \nमंगला दर्शन पश्चात प्रभु को केसर युक्त चन्दन\, आवंला\, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है. \nआज से प्रभु को ज़री के वागा धराये जाने आरम्भ हो जाते हैं जो कि बसंत पंचमी से एक दिन पूर्व तक धराये जायेंगे. ठाडे वस्त्र भी दरियाई के आरम्भ हो जाते हैं. \nज़री के वस्त्र प्रभु के श्रीअंग पर चुभें नहीं इस भाव से आज से प्रतिदिन प्रभु को सामान्य वस्त्रों के भीतर आत्मसुख के वागा धराये जाते हैं.\nआत्मसुख के वागा विजयदशमी से कार्तिक शुक्ल दशमी तक (मलमल के) व कार्तिक शुक्ल (देवप्रबोधिनी) एकादशी से डोलोत्सव तक (शीत वृद्धि के अनुसार रुई के) धराये जाते हैं. \nआज निर्गुण भक्तों के भाव की सेवा है अतः श्रीजी को नियम के रुपहली ज़री के श्वेत घेरदार वागा धराये जाते हैं और श्रीमस्तक पर रुपहली ज़री की पाग पर मोरपंख की सादी चंद्रिका धरायी जाती है.\nआज श्रृंगार में विशेष यह है कि आज प्रभु के दायें श्रीहस्त में प्राचीन पन्ना की जडाऊ कटार धरायी जाती है. \nगोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से मनोर (जलेबी-इलायची) के लड्डू और विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. \nराजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.\nसखड़ी में केसरयुक्त पेठा व मीठी सेव अरोगायी जाती है. आज से राजभोग समय अरोगाये जाने वाले फीका\, थपडी के स्थान पर तले जमीकंद (सूरण\, अरबी\, रतालू व शकरकन्द) अरोगाये जाते हैं. \nशक्तिरूपेण भाव से राजभोग समय प्राचीन मगर की खाल से बनी ढाल (जिसमें स्वर्ण का अद्भुत काम किया हुआ है) को तबकड़ी पर प्रभु के सम्मुख रखा जाता है एवं राजभोग पश्चात हटा लिया जाता है. \nइसी भाव से एक दिवस पूर्व संध्या काल में प्रभु के स्वरुप के पीछे एक लकड़ी के लम्बे संदूक में विभिन्न आकारों की ढालें\, तलवारें\, अद्भुत काम से सुसज्जित कटारें\, धनुष-बाण\, चाकू आदि विभिन्न अस्त्र-शस्त्र रखे जाते हैं जिन्हें दशहरा के दिन संध्या-आरती दर्शन के उपरांत हटा लिया जाता है. \nतृतीय गृह प्रभु श्री द्वारकाधीशजी आदि कुछ पुष्टि स्वरूपों में नवरात्रि के अंतिम दिनों में अस्त्र\, शस्त्र प्रभु के सम्मुख रखे जाते हैं. \nराजभोग दर्शन – \nकीर्तन – (राग : नट बिलावल) \nआन और आन कहत भेचक रहत व्रजनारी नर l\nकटु तिकत आम्ल मधुर खारे सलोने प्रकार खटरसको प्रीतसों आरोगत सुन्दरवर ll 1 ll\nगिरिराज बरन बरन शिला जु सहस्त्रन मोदक ठोर ठोर बेसन गुंजा बाबरन l\n‘राजाराम’के प्रभु को अचवावन कारन इन्द्र झारी भर लायो जलधर ll 2 ll \nसाज – आज श्रीजी में हरे रंग के आधार वस्त्र पर पुष्प-पत्रों की लता के सुरमा-सितारा के कशीदे के ज़रदोज़ी के भरतकाम वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी\, तकिया और चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है. \nवस्त्र – श्रीजी को आज रुपहली ज़री का सूथन\, चोली एवं घेरदार वागा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र गहरे हरे दरियाई के धराये जाते हैं. पटका सुनहरी ज़री का धराया जाता है. \nश्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. माणक की प्रधानता एवं जड़ाव सोने के आभरण धराये जाते हैं.\nश्रीमस्तक पर चीरा (रुपहली ज़री की पाग) के ऊपर माणक का पट्टीदार सिरपैंच\, लूम\, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.\nकिलंगी नवरत्न की धराई जाती हैं.\nस्वर्ण का जड़ाव का चौखटा पीठिका के ऊपर धराया जाता है.\nकली\, कस्तूरी वल्लभी आदि माला धरायी जाती हैं.\nश्रीकर्ण में चार कर्णफूल धराये जाते हैं. गुलाब एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.\nश्रीहस्त में कमलछड़ी\, माणक के वेणुजी एवं वेत्रजी (एक हीरा का) धराये जाते हैं.\nदायें श्रीहस्त में ही आज विशेष रूप से पन्ने की कटार (श्री मुरलीधरजी वाली) धरायी जाती है.\nपट रुपहली ज़री का व गोटी चांदी की आती है.\nआरसी शृंगार में चार झाड़ की एवं राजभोग में सोना की दिखाई जाती है.\nगिरिधरलाल जवारे बांधत बन्यो है भाल कुंकुम को टीको ।।१।।\nआरती करत देत न्यौछावर चिरज़ीयो लाल भामतो जीको।\nआसकरन प्रभु मोहन नागर त्रिभुवन को सुख लागत फीको ।।२।। \nआज से अन्नकूट महायज्ञ की झांझ की बधाई बैठती है. अन्नकूट के कीर्तन गाये जाते हैं. अन्नकूट की सामग्री के निर्माण के प्रारंभ हेतु बालभोग का भट्टी-पूजन किया जाता है एवं श्रीजी के मुखियाजी प्रभु के मुख्य बालभोगिया को बीड़ा देकर अनसखड़ी की सेवा प्रारम्भ करने की आज्ञा देते हैं. \nनवरात्री के प्रथम दिन बोये जवारा उत्थापन समय सिद्ध कर लिए जाते हैं.\nसायंकाल भोग के दर्शन में श्रीजी को तिलक\, अक्षत किया जाता है\, बीड़ा पधराये जाते हैं.\nप्रभु के श्रीमस्तक पर पहले से धरायी मोर चन्द्रिका को बड़ा (हटा) कर उसके स्थान पर सिद्ध जवारा में से उत्तमोत्तम जवारा स्वर्ण की अंगूठीनुमा कड़ी में रेशमी डोरे से बांध\, कलंगी बना कर धराये जाते हैं.\nइस दौरान झालर-घंटा\, शंखादी बजाये जाते हैं और धूप-दीप किये जाते हैं. चरणारविन्द में तुलसी व जवारा समर्पित किये जाते हैं और मुठियाँ वार के चांदी की थाली में आरती की जाती है. \nजवारा धरावे तब यह पद गाया जाता है. \nआज दशहरा शुभ दिन नीको ।\nगिरिधरलाल जवारे बांधत बन्यो है भाल कुंकुम को टीको ।।१।।\nआरती करत देत न्यौछावर चिरज़ीयो लाल भामतो जीको।\nआसकरन प्रभु मोहन नागर त्रिभुवन को सुख लागत फीको ।।२।। \nतदुपरांत संध्या-आरती के भोग में श्रीजी को उत्सव भोग अरोगाये जाते हैं.\nउत्सव भोग में विशेष रूप से 10 माट अरोगाये जाते हैं जो कि दस प्रकार के भक्तों की भावना से अरोगाये जाते हैं. इसके संग बीज चालनी का सूखा मेवा\, कच्चर व दूधघर में सिद्ध बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.\nप्रत्येक माट का वजन लगभग 20 किलो होता है और वर्ष भर में केवल आज के दिन ही अरोगाये जाते हैं. \nआज भोग समय श्रीजी को अरोगाये जाने वाले फीका के स्थान पर घी में तले बीज-चालनी का सूखा मेवा अरोगाया जाता है व आरती में अरोगाये जाने वाले ठोड के स्थान पर बूंदी के बड़े लड्डू अरोगाये जाते हैं.\nशाकघर में सिद्द मावे का मेवा मिश्रित माट भी आज ठाकुरजी को अरोगाये जाते हैं. \nआज सायंकाल संध्या-आरती दर्शन पश्चात श्रीजी में अश्व पूजन होता है. श्रीकृष्ण भण्डार के अधिकारीजी श्री महाप्रभुजी की बैठक के चौक में श्रीजी के मुख्य पंड्याजी श्रीनाथ गार्ड्स की उपस्थिति में मंत्रोच्चार के मध्य मन्दिर पलटन के अश्वों का पूजन करते हैं एवं मुख्य कमांडिंग ऑफिसर\, अश्वचालक को वस्त्र आदि प्रदान करते हैं. \nसंध्या-आरती दर्शन उपरांत प्रातः धराये श्रीकंठ के आभरण बड़े कर छेड़ान के श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर मोती की लूम व किलंगी में नए जवारा धराये जाते हैं. \nआज से श्रीजी में शयन के दर्शन बाहर खुलना प्रारंभ हो जाते हैं जो कि आगामी मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी (नित्यलीलास्थ श्री गोकुलनाथजी के उत्सव के एक दिन पूर्व) तक अर्थात लगभग 55 दिन तक प्रतिदिन सायंकाल लगभग 7 बजे होंगे. \nआज से लगभग 35 दिन तक प्रतिदिन सायंकाल कमलचौक में मानसीगंगा के दीपवृक्ष (आकाशदीप) की स्थापना की जाती है. ऐसी मान्यता है कि इसमें दीप प्रज्वलित करने से बालकों पर अनिष्ट की निवृति होती है एवं अतुल्य संपत्ति एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है. इसी भाव से आज से सुदर्शन चक्रराज के समक्ष भी तिल के तेल का दीपक (आकाशदीप) प्रज्वलित किया जाता है. Source : Shrinathji Temple Management\n: facebook page : Shreenathji Nity darshan
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DESCRIPTION:द्वितीय विलास \nसखी : श्री ललिताजी \nसामग्री : पायस \nरंग : पीला \nस्थली : संकेत वन \n| नव विलास \, दशहरा\, शरद पूर्णिमा के पद : https://vrajdwar.org/hi/adhyayan/padhya-sahitya/  \n 
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DESCRIPTION:नवरात्रारम्भः । मातामह श्राद्ध। अंकुर रोपण \n आज माटी के १० मिट्टी के बर्तन मे बीज रोपण होता है | १० दिन तक यह बीज की वृद्धि होती है जो हमारे भाव की वृद्धि के भाव से है | फिर दशेरा के दिन जवार के शृगार श्री मस्तक पर धराए जाते है | यह १० वर्तन १० गुण के भक्त के भाव से होते है | जो सात्विक\, राजस\, तामस से ९ गुण बनते है और १ निर्गुण इस तरह १० गुण के भक्तों के भाव से होते है | \n आज से प्रभु ९ दिन एक एक सखी के मनोरथ स्वरूप रोज भिन्न स्थली पर पधारकर नव विलास की लीला करेंगे | वा दिन की सखी के भावसे प्रभु को सामग्री धरी जाएंगी | रोज के वस्त्र के रंग भी भिन्न और निर्धारित होते है | \n प्रथम विलास \n मुख्य सखी : श्री चन्द्रावलीजी\n रास की स्थली : वृंदावन\n वस्त्र के रंग : लाल\n मख्य सामग्री : चंद्रकला      नव विलास \, दशहरा\, शरद पूर्णिमा के पद : https://vrajdwar.org/hi/adhyayan/padhya-sahitya/
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DESCRIPTION:सर्वपितृ अमावस | कोट की आरती और सांझी की समाप्ति
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DESCRIPTION:श्री गुसांईजी के तीसरे लाल जी श्री बालकृष्णजी को उत्सव (1606)|  PushtiMarg Aacharyas
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DESCRIPTION:श्री महाप्रभुजी के ज्येष्ठ पुत्र श्री गोपीनाथजी को उत्सव (1567)।  PushtiMarg Aacharyas
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SUMMARY:भाद्रपद कृष्णपक्ष 11
DESCRIPTION:इन्दिरा एकादशी व्रतम् ( महादान) ।
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