BEGIN:VCALENDAR
VERSION:2.0
PRODID:-//Vraj Dwar - ECPv6.15.20//NONSGML v1.0//EN
CALSCALE:GREGORIAN
METHOD:PUBLISH
X-WR-CALNAME:Vraj Dwar
X-ORIGINAL-URL:https://vrajdwar.org
X-WR-CALDESC:Events for Vraj Dwar
REFRESH-INTERVAL;VALUE=DURATION:PT1H
X-Robots-Tag:noindex
X-PUBLISHED-TTL:PT1H
BEGIN:VTIMEZONE
TZID:Asia/Kolkata
BEGIN:STANDARD
TZOFFSETFROM:+0530
TZOFFSETTO:+0530
TZNAME:IST
DTSTART:20240101T000000
END:STANDARD
END:VTIMEZONE
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251026
DTEND;VALUE=DATE:20251027
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121544Z
LAST-MODIFIED:20250722T121544Z
UID:30739-1761436800-1761523199@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 5
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-5/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251025
DTEND;VALUE=DATE:20251026
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121543Z
LAST-MODIFIED:20250722T121543Z
UID:30737-1761350400-1761436799@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 4
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-4/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251024
DTEND;VALUE=DATE:20251025
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121542Z
LAST-MODIFIED:20250722T121542Z
UID:30735-1761264000-1761350399@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 3
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-3/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251023
DTEND;VALUE=DATE:20251024
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121542Z
LAST-MODIFIED:20250722T121542Z
UID:30733-1761177600-1761263999@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 2
DESCRIPTION:यम द्वितीया (भाईदूज)। \nआज सभी द्वार में हल्दी से डेली माड़ी जाती है।व बन्दर वाल बाँधी जाती है।थाली की आरती।आरसी चार झाड़ की।बंटा\,कुंजा\,तकिया जडाऊ। \nवस्त्र:- घेरदार बागा\,चोली\,सुथन सब लाल खिनखाब के।चीरा सुनहरी\,फुलक साही जरी को।पटका रूपहरी जरी को\,एक छोर आगे\,एक बगल को।ठाड़े वस्त्र चिकने(लट्ठा)के।पिछवाई लाल \,मोतीं के काम की\,नि. ली.गोस्वामी श्री गोवर्धन लाल जी महाराज की। \nआभरण:- श्रंगार हल्के। आभरण सब पन्ना के\, उत्सव के।चार माला\,चीरा पे सिरपेच की जगह पन्ना धरावे।वाके ऊपर नीचे मोतीं की माला धरावे।श्री कर्ण में पन्ना के कर्णफूल एक जोड़ी।श्रीमस्तक पे एक मोर चन्द्रिका सादा।वेणु वेत्र हीरा के। \nश्रीमस्तक पर सुनहरी फुलक शाही ज़री की पाग (चीरा) के ऊपर सिरपैंच के स्थान पर पन्ना\, जिसके ऊपर नीचे मोती की लड़\, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं | \nराजभोग के आगे के भोग धरके राजभोग की माला धरावे।दंडवत करे।झालर\,घंटा\,शंख\,नोबत बजे \,फिर श्री के तिलक होवे।बीड़ा\,तुलसी समर्पे।फिर सब स्वरूप को तिलक होवे।चार मुठिया वार के चुन की आरती होवे।न्योछावर होवे।फिर आप श्री के और आप श्री \,सब सेवकन के तिलक करे।   \nबहन सुभद्रा के घर भोजन अरोगें इस भाव से प्रभु आज राजभोग अरोगते हैं | \nआरती पीछे श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े होवे।लूम तुर्रा सुनहरी। \nगोपी वल्लभ कुर के पके गूंजा।फिका में चालनी। \nमंगला – लीला लाल गोवर्धनधर की  \nराजभोग – महिमा में जानी अब न छडो  \nआरती – कान्ह कुँवर के कर पल्लव  \nशयन – राजे गिरिराज आज  \nमान – आली री मान गढ  \nपोढवे – सोवत नींद आय गई \nराजभोग समय तिलक होवे – आज दूज भैय्या की कहियत कर लिये कंचन थाल \nSeva kram  courtesy: Shrinathji Temple Nathdwara Management |  \nधन त्रयोदशी से देव प्रबोधिनी एकादशी के पद
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-2/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251022
DTEND;VALUE=DATE:20251023
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121541Z
LAST-MODIFIED:20250722T121541Z
UID:30731-1761091200-1761177599@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 1
DESCRIPTION:गुर्जराणां 2082 वर्षारम्भः ।
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-1/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251021
DTEND;VALUE=DATE:20251022
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121540Z
LAST-MODIFIED:20250722T121540Z
UID:30729-1761004800-1761091199@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 30
DESCRIPTION:अन्नकूटोत्सव | गोवर्द्धन पूजा । \nगोवर्धन पूजा\, अन्नकूट महोत्सव \nअन्नकूट कोटिन भांतनसो भोजन करत गोपाल ।\nआपही कहत तात अपनेसों गिरि मूरति देखो तत्काल ।।१।।\nसुरपति से सेवक इनही के शिव विरंची गुण गावे ।\nइनहीते अष्ट महा सिध्धि नवनिधि परम पदारथ पावे ।।२।।\nहम गृह बसत गोधन बन चारत गोधन ही कुलदेव ।\nइने छांड जो करत यज्ञ विधि मानो भींतको लेव ।।३।।\nयह सुन आनंदे ब्रजवासी आनंद दुंदुभी बाजे ।।\nघरघर गोपी मंगल गावे गोकुल आन बिराजे ।।४।। \nमंगला दर्शन उपरांत डोल-तिबारी में अन्नकूट भोग सजाये जाने प्रारंभ हो जाते हैं अतः अन्य सभी समां के दर्शन भीतर होते हैं. दिन भर का पूरा सेवाक्रम भीतर होता रहता है. \nराजभोग दर्शन – \nसाज – श्रीजी में सर्व साज दीपावली के दिवस धरा हुआ ही आज भी धराया जाता है. \nवस्त्र – श्रीजी को आज दीपावली के दिवस धरे गये श्वेत ज़री के वस्त्र ही धराये जाते हैं.  \nश्रृंगार वृद्धि में राजभोग के पश्चात ऊर्ध्व भुजा की ओर लाल रंग का ज़री का बिना तुईलैस किनारी बिना का पीताम्बर धराया जाता है जिनके दो अन्य छोर चौखटे के ऊपर रहते हैं.\nऐसा पीताम्बर वर्ष में दो बार (आज के दिन व जन्माष्टमी\, नन्दोत्सव के दिन) धराया जाता है.\nजन्माष्टमी\, नन्दोत्सव के दिन यह केवल चौखटे पर धराया जाता है परन्तु आज यह श्रीहस्त में भी धराया जाता है.\nप्रभु यह पीताम्बर गायों\, ग्वालों और निजजनों पर फिरातें हैं जिससे उनको नज़र ना लगे.\nचतुर्भुजदास जी ने इस भाव का एक पद भी गाया है. \nखेली बहु खेली गाय\, बुलाई घुमर घोरी ।\nबछरा ऊपर ‘ऊपरना फेरत’ दाढ़ मेल के डोरी ।।\nआप गोपाल फ़ूक मारत है गौ सुत भरत अंकोरी ।\nघों घों करत लकुट कर लीने ‘मुख फेरत पिछोरी’ ।। \nश्रृंगार – आज अभ्यंग नहीं होता. सर्व श्रृंगार दीपावली के दिवस के ही रहते हैं.\nआज दो जोड़ी के एक माणक और एक पन्ना की प्रधानता वाले शृंगार धरे जाते हैं. दोनो हालरा नहीं धराये जाते हैं.\nकेवल श्रीमस्तक के ऊपर लाल रंग की ज़री की तुई की किनारी वाला गौकर्ण धराया जाता है.\nइसी प्रकार कुल्हे के ऊपर सिरपैंच बड़ा कर दिया जाता है और इसके बदले जड़ाव पान धराया जाता है.\nकमलछड़ी एवं पुष्प मालाजी दीपावली के दिवस के होते हैं अतः बदले जाते हैं.\nश्रीहस्त में जड़ाव सोने के वेणुजी और दो वेत्रजी धराये जाते हैं. \nराजभोग आरती होवे पीछे तिलकायतश्री मिड्ढा (चाँवल रखने का घास निर्मित कुआ) में सेव\,घी\,बुरा पधराय के महूर्त करते हैं फिर अन्नकूट के भोग धराना शुरू होते हैं.\nआज राजभोग पश्चात अनोसर नहीं होते. दोपहर लगभग 3 बजे श्रीजी के छड़ीदारजी\, समाधानीजी\, श्री कृष्ण-भण्डार के अधिकारीजी\, मुख्य निष्पादन अधिकारी\, गौशाला के ग्वाल-बाल आदि विशिष्टजन कीर्तन समाज के साथ द्वितीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी को पधराने उनके घर (मंदिर) जाते हैं.\nश्रीजी के ग्वालबाल श्रीजी मंदिर की सात परिक्रमा कर गीत गाते हुए श्री विट्ठलनाथजी के घर उन्हें गोवर्धनपूजा में आने का आमंत्रण देते हैं.\nतदुपरांत द्वितीय गृहाधीश श्री कल्याणरायजी महाराज अन्य गुसाई बालकों की अगुआई में श्री ठाकुरजी को सुखपाल में विराजित कर वैष्णवों के संग कीर्तन की स्वर लहरियों के मध्य श्रीजी में अन्नकूट अरोगाने पधराते हैं.  \nश्री विट्ठलनाथजी को श्रीजी सम्मुख विराजित कर पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री श्रीजी से आज्ञा लेकर चिरंजीवी श्री विशालबावा\, पूज्य श्री कल्याणरायजी\, श्री हरिरायजी\, श्री वागीशजी एवं उपस्थित अन्य गौस्वामी बालकों और श्रीजी के सभी मुख्य सेवकों के साथ श्री नवनीतप्रियाजी को पधारने जाते हैं. \nवहां श्री नवनीतप्रियाजी के मुखियाजी पूज्य तिलकायत व चिरंजीव विशाल बावा को टोरा बाँधते हैं.\nखासा-भण्डार के सेवक हल्दी\, गुलाल एवं अबीर से रंगोली छांटते चलते हैं जिसपर होकर पूज्य तिलकायत एवं चिरंजीव श्री विशालबावा श्री नवनीतप्रियाजी व श्रीजी के सेवकों के संग प्रभु को बीड़ा अरोगाते खुली स्वर्ण की चकडोल में विराजित कर गोवर्धन-पूजा के चौक में सूरजपोल के पावन सोपानों पर विराजित करते हैं.\nदोनों स्वरूपों के पधारने और गोवर्धन पूजन के दौरान किर्तनिया ‘चले रे गोपाल…गोवर्धन पूजन’ कीर्तन गाते रहते हैं.\nतदुपरांत गौ-माताएँ कानजगाई के दिवस की भांति ही धूमधाम से क्रीड़ा करती हुई मंदिर मार्ग को अपनी रुनझुन से निनादित करती हुई श्रीजीमंदिर के गोवर्धन-पूजा के चौक में पधारती हैं.\nप्रभु श्री नवनीतप्रियाजी को विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध केशर मिश्रित दूध की दो चपटिया (मटकी) का भोग अरोगाया जाता है और गोवर्धन-पूजा शुरु हो जाती है.\nचिरंजीव श्री विशालबावा गोवर्धन-पूजा के मध्य प्रभु को शिरा-विहीन पान अरोगाते रहते हैं.\nइस पूर्व दोपहर में गोवर्धन पूजा के चौक में गोबर से गोवर्धन का निर्माण किया जाता है जिसे सिन्दूर से रंगी लकड़ी के जाली से ढंका गया होता है.\nपूज्य तिलकायत मानसी-गंगा के जल\, दूध\, चंदन\, कूमकुम आदि विविध सामग्रियों से से लगभग पौन घंटे तक गोवर्धन-पूजा करते हैं.\nतदुपरांत टेरा लेकर श्रीगोवर्धन को विशाल टोकरों में रखे महाप्रशाद का भोग अरोगाया जाता है.\nभोग के पश्चात झालर-घण्टों और शंख की ध्वनि के मध्य आरती की जाती है.\nइसके बाद श्रीजी के दूधघर के ग्वाल\, गौशाला के बड़े ग्वाल तथा सातों घरों के ग्वालों\, पानघरिया\, फूल-घरिया\, ख़ासाभंडारी\, परछना मुखिया आदि मंदिर के विविध विभागों के प्रमुखों को तिलकायत श्री ‘टौना’ बाँध कर मठड़ी\, पान का बीड़ा व सेव लड्डू का नेग देते हैं.\nगोवर्धन-पूजा के पूर्ण होने पर श्रीनवनीतप्रियाजी बगीचे के रास्ते से होते हुए श्रीजी के सम्मुख अन्नकूट अरोगने पधारते हैं. इधर गोबर के गोवर्धन पर गौएँ चढ़ाई जाती हैं.\nगौधूली वेला में गायें अपने अस्थायी विश्रामस्थल पर ले जायी जाती हैं जहाँ पर श्रीजी की ओर से गायों को गेहूं दलिया व गुड की थूली खिलाई जाती है.\nइसके तुरन्त बाद सभी गायें नगर के प्राचीन मार्ग गुर्जरपुरा से खेलते हुए नाथूवास स्थित गौशाला में चली जाती हैं.\nनगरवासी व वैष्णव गोबर के गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं. अन्नकूट उत्सव गोवर्धन-पूजा के पश्चात श्री नवनीतप्रियाजी भीतर पधार श्रीजी के सम्मुख विराजित होकर अन्नकूट अरोगते हैं. \nअन्नकूट  \nडोलतिवारी के पिछले दो खण्डों में घास का ‘मिढ़ा’ (चाँवल रखने का घास निर्मित कुआ) बनाया जाता है जिस में अन्नकूट के डेढ़ सौ मण से अधिक भात (चांवल) का ढेर लगा अन्नकूट (अर्थात अन्न का शिखर) बनाया जाता है.\nउसके ऊपर चारों दिशाओं में घी में सेके हुए कसार के चार बड़े गुंजे और मध्य में एक गुंजा चक्र का आधा भीतर व आधा बाहर रखा जाता है.\nचारों दिशाओं के गुंजों पर क्रमशः शंख\, चक्र\, गदा व पद्म उकेरे  जाते हैं.\nशिखर पर तुलसी की मोटी माला धराई जाती है. इसके चारों ओर सखड़ी की सामग्रियां रखी जाती हैं.\nइन सामग्रियों से पौना रतनचौक और पूरी डोलतिवारी भर जाती है. \nइसके अतिरिक्त दूधघर तथा बालभोग की सामग्री निज मंदिर\, मणिकोठा एवं छठीकोठा में चार-चार टोकरे में एक के ऊपर एक करके रखी जाती है.\nप्रभु समक्ष भोग धरकर अन्नकूट के सेवक चिरंजीवी श्री विशाल बावा के संग अन्नकूट के मुखिया की अगुआई में श्रीजी मंदिर की बाहर की परिक्रमा करते हैं.  \nलगभग डेढ़ घंटे के पश्चात भोग सरने प्रारंभ हो जाते हैं. अनसखड़ी की सभी सामग्रियां हटा ली जाती है जबकि सखड़ी की केवल शाक\, दाल आदि की मटकियाँ रहने दी जाती हैं. लगभग 8.30 बजे दर्शन खुल जाते हैं. \nइन दर्शनों में थोड़ी-थोड़ी देर में विभिन्न भावों से नौ बार आरती होती है.\nचौथी आरती के बाद रात्रि लगभग 11.30 बजे भीलों को चाँवल लूटने दिया जाता है. भोग सरने के बाद भी दर्शनों में श्रीजी के सम्मुख निज मंदिर में आठ-आठ टोकरे रखे रहते हैं परन्तु इन्हें प्रभु श्री विट्ठलनाथजी के घर पधारने के पूर्व हटा लिया जाता है.\nपाँचवीं आरती के बाद द्वितीय पीठाधीश श्री कल्याणरायजी अपने सेवकों सहित पधार कर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी को अपने घर पधरा ले जाते हैं.\nनवीं और अंतिम आरती के पश्चात श्री नवनीतप्रियाजी बगीचे से होकर अपने घर पधार जाते हैं. \nश्री नवनीतप्रियाजी व श्री विट्ठलनाथजी अन्नकूट पश्चात घर पधारें तब यह कीर्तन गाया जाता है.\nपूज के घर आये गोवर्धन\, पूज के घर आये l\nजननी जसोदा करत आरती\, मोतिन चौक पुराये…ll 1 ll\nमंगल कलश विराजत द्वारे\, वन्दनमाल बंधाये…ll 2 ll लालदास गीरवर गीर पूज्यो\, भये भक्तन मन भाये…ll 3 ll \nउत्थापन के बाद का सेवाक्रम सभी तीन मंदिरों में इसके बाद होता है व लगभग 4 बजे शयन के अनोसर होते हैं.\nSource : Source : Shrinathji Temple Management\n       : facebook page : Shreenathji Nity darshan \nधन त्रयोदशी से देव प्रबोधिनी एकादशी के पद
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-30/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251020
DTEND;VALUE=DATE:20251021
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121539Z
LAST-MODIFIED:20250722T121539Z
UID:30727-1760918400-1761004799@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 14
DESCRIPTION:रूप चतुर्दशी (अभ्यंग)\, दीपावली (दीपोत्सव) हटड़ी (गोकर्ण जागरणम्) कान जगाई। दीपोत्सव  \nयह दिवारी वरस दिवारी\, तुमको नित्य नित्य आवो ।\nनंदराय और जसोदारानी\, अति सुख पूजही पावो ।।१।।\nपहले न्हाय तिलक गोरोचन\,देव पितर पूजवो ।\n श्रीविट्ठलगिरिधरन संग ले गोधन पूजन आवो ।।२।। \nश्रीजी को नियम के लाल सलीदार ज़री की सूथन\, फूलक शाही श्वेत ज़री की चोली\, चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर ज़री की कुल्हे के ऊपर पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ धरायी जाती है. \nआज विशेष रूप से श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में दीवला व दूधघर में सिद्ध की गयी केसरयुक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. \nराजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता और सखड़ी में केसरयुक्त पेठा\, मीठी सेव आदि अरोगाये जाते हैं.  \nभोग समय फीका के स्थान पर बीज-चालनी के सूखे मेवे अरोगाये जाते हैं.\nआरती समय अरोगाये जाने वाले ठोड के स्थान पर गेहूँ के पाटिया के बड़े लड्डू अरोगाये जाते हैं.  \nराजभोग दर्शन –  \nकीर्तन – (राग : सारंग) \nगुड़ के गुंजा पुआ सुहारी\, गोधन पूजत व्रज की नारी ll 1 ll\nघर घर गोमय प्रतिमा धारी\, बाजत रुचिर पखावज थारी ll 2 ll\nगोद लीयें मंगल गुन गावत\, कमल नयन कों पाय लगावत ll 3 ll\nहरद दधि रोचनके टीके\, यह व्रज सुरपुर लागत फीके ll 4 ll\nराती पीरी गाय श्रृंगारी\, बोलत ग्वाल दे दे करतारी ll 5 ll\n‘हरिदास’ प्रभु कुंजबिहारी मानत सुख त्यौहार दीवारी ll 6 ll \nसाज – आज श्रीजी में नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री दाऊजी महाराज (द्वितीय) कृत जड़ाव की\, श्याम आधारवस्त्र पर कूंडों में वृक्षावली एवं पुष्प लताओं के मोती के सुन्दर ज़रदोज़ी के काम वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी\, तकिया जडाऊ एवं चरणचौकी पर लाल रंग की मखमल की बिछावट की जाती है.  \nवस्त्र – श्रीजी को आज लाल सलीदार ज़री का सूथन\, फूलक शाही श्वेत ज़री के रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित चोली एवं चाकदार वागा धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र अमरसी रंग के धराये जाते हैं. \nश्रृंगार – श्रीजी को आज वनमाला का (चरणारविन्द तक) तीन जोड़ी (माणक\, हीरा-माणक व पन्ना) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा – हीरे\, मोती\, माणक\, पन्ना तथा जड़ाव सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं.\nश्रीमस्तक पर फूलकशाही श्वेत ज़री की जडाव की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच\, तथा पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में हीरा के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर माणक की चोटी (शिखा) धरायी जाती है.\nपीठिका के ऊपर प्राचीन हीरे का जड़ाव का चौखटा धराया जाता है.\nश्रीकंठ में बघनखा धराया जाता है. गुलाबी एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर थागवाली मालाजी धरायी जाती है.\nश्रीहस्त में कमलछड़ी\, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.\nआरसी जड़ाऊ की आती हैं. \nकान जगाई \nश्री नवनीतप्रियाजी में सायं कानजगाई के व शयन समय रतनचौक में हटड़ी के दर्शन होते हैं.  \nकानजगाई – संध्या समय गौशाला से इतनी गायें लायी जाती है कि गोवर्धन पूजा का चौक भर जाए. गायें मोरपंख\, गले में घंटियों और पैरों में घुंघरूओं से सुशोभित व श्रृंगारित होती हैं. उनके पीठ पर मेहंदी कुंकुम के छापे व सुन्दर आकृतियाँ बनी होती है.  \nग्वाल-बाल भी सुन्दर वस्त्रों में गायों को रिझाते\, खेलाते हैं. गायें उनके पीछे दौड़ती हैं जिससे प्रभुभक्त\, नगरवासी और वैष्णव आनन्द लेते हैं. \nगौधूली वेला में शयन समय कानजगाई होती है. श्री नवनीतप्रियाजी के मंदिर से लेकर सूरजपोल की सभी सीढियों तक विभिन्न रंगों की चलनियों से रंगोली छांटी जाती है.  \nश्री नवनीतप्रियाजी शयन भोग आरोग कर चांदी की खुली सुखपाल में विराजित हो कीर्तन की मधुर स्वरलहरियों के मध्य गोवर्धन पूजा के चौक में सूरजपोल की सीढ़ियों पर एक चौकी पर बिराजते हैं.  \nप्रभु को विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध केशर मिश्रित दूध की चपटिया (मटकी) का अरोगायी जाती है.  \nकानजगाई के दौरान प्रभु को शिरारहित पान की बीड़ी अरोगाते हैं.\nश्रीजी व श्री नवनीतप्रियाजी के कीर्तनिया कीर्तन करते हैं व झालर\, घंटा बजाये जाते हैं.\nपूज्य श्री तिलकायत महाराज गायों का पूजन कर\, तिलक-अक्षत कर लड्डू का प्रशाद खिलाते हैं. गौशाला के बड़े ग्वाल को भी प्रशाद दिया जाता है.  \nतत्पश्चात पूज्य श्री तिलकायत नंदवंश की मुख्य गाय को आमंत्रण देते हुए कान में कहते हैं – “कल प्रातः गोवर्धन पूजन के समय गोवर्धन को गूंदने को जल्दी पधारना.” गायों के कान में आमंत्रण देने की इस रीती को कानजगाई कहा जाता है.\nप्रभु स्वयं गायों को आमंत्रण देते हैं ऐसा भाव है. इसके अलावा कानजगाई का\nएक और विशिष्ट भाव है कि गाय के कान में इंद्र का वास होता है और प्रभु कानजगाई के द्वारा उनको कहते हैं कि – “हम श्री गिरिराजजी को कल अन्नकूट अरोगायेंगे\, तुम जो चाहे कर लेना.” सभी पुष्टिमार्गीय मंदिरों में अन्नकूट के एक दिन पूर्व गायों की कानजगाई की जाती है. \nसारस्वतकल्प में श्री ठाकुरजी ने जब श्री गिरिराजजी को अन्नकूट अरोगाया तब भी इसी प्रकार कानजगाई की थी.\nश्री ठाकुरजी\, नंदरायजी एवं सभी ग्वाल-बाल अपनी गायों को श्रृंगारित कर श्री गिरिराजजी के सम्मुख ले आये. श्रीनंदनंदन की आज्ञानुसार श्री गिरिराजजी को दूध की चपटिया (मटकी) का भोग रखा गया और बीड़ा अरोगाये गये.  \nश्री गर्गाचार्यजी ने नंदबाबा से गायों का पूजन कराया था. तब श्री ठाकुरजी और नंदबाबा ने एक-एक गाय के कान में अगले दिन गोवर्धन पूजन हेतु पधारने को आमंत्रण दिया.  \nश्रीजी के शयन के दर्शन बाहर नहीं खुलते. \nशयन समय श्री नवनीतप्रियाजी रतनचौक में हटड़ी में विराजित हो दर्शन देते हैं.\nहटड़ी में विराजने का भाव कुछ इस प्रकार है कि नंदनंदन प्रभु बालक रूप में अपने पिता श्री नंदरायजी के संग हटड़ी (हाट अथवा वस्तु विक्रय की दुकान) में बिराजते हैं और तेजाना\, विविध सूखे मेवा व मिठाई के खिलौना आदि विक्रय कर उससे एकत्र धनराशी से अगले दिन श्री गिरिराजजी को अन्नकूट का भोग अरोगाते हैं. \nरात्रि लगभग 8.30 बजे तक दर्शन खुले रहते हैं और दर्शन उपरांत श्री नवनीतप्रियाजी श्रीजी में पधारकर संग विराजते हैं. \nश्री गुसांईजी\, उनके सभी सात लालजी\, व तत्कालीन परचारक महाराज काका वल्लभजी के भाव से 9 आरती होती है.\nश्री गुसांईजी व श्री गिरधरजी की आरती स्वयं श्री तिलकायत महाराज करते हैं.\nअन्य गृहों के बालक यदि उपस्थित हों तो वे श्री तिलकायत से आज्ञा लेकर सम्बंधित गृह की आरती करते हैं और अन्य की उपस्थिति न होने पर स्वयं तिलकायत महाराज आरती करते हैं.  \nकाका वल्लभजी की आरती श्रीजी के वर्तमान परचारक महाराज गौस्वामी चिरंजीवी श्री विशालबावा करते हैं.    \nआज श्रीजी में शयन पश्चात पोढावे के व मान के पद नहीं गाये जाते.\nदिवाली की रात्रि शयन उपरांत श्रीजी व श्री नवनीतप्रियाजी प्रभु लीलात्मक भाव से गोपसखाओं\, श्री स्वामिनीजी\, सखीजनों सहित अरस-परस बैठ चौपड़ खेलते हैं.\nअखण्ड दीप जलते हैं\, चौपड़ खेलने की अति आकर्षक\, सुन्दर भावात्मक साज-सज्जा की जाती है.  \nदीप इस प्रकार जलाये जाते हैं कि प्रभु के श्रीमुख पर उनकी चकाचौंध नहीं पड़े. इस भावात्मक साज-सज्जा को मंगला के पूर्व बड़ाकर (हटा) लिया जाता है.  \nइसी भाव से दिवाली की रात्रि प्रभु के श्रृंगार बड़े नहीं किये जाते और रात्रि अनोसर भी हल्के श्रृंगार सहित ही होते हैं.  \nकान जगाई \n“गोवर्धन पूजन के समय गोवर्धन को गूंदने को जल्दी आना” का निमंत्रण लेकर प्रस्थान करती हुई गायें  | Source : Source : Shrinathji Temple Management\n       : facebook page : Shreenathji Nity darshan \nधन त्रयोदशी से देव प्रबोधिनी एकादशी के पद
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-14/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251019
DTEND;VALUE=DATE:20251020
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121538Z
LAST-MODIFIED:20250722T121538Z
UID:30725-1760832000-1760918399@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 13
DESCRIPTION:धन तेरस  \nसेवा क्रम :  \nमणि कोठा में रंगोली व दीपक को पाट आवे।निज मंदिर में रोशनी को झाड़ आवे।डेली मंडे\, बंदरवाल बंधे।चारो समय आरती थाली की । \nसाज :- श्रीजी में आज लाल रंग की मखमल के ऊपर सुनहरी सुरमा सितारा के कशीदे के ज़रदोज़ी के काम वाली पिछवाई धरायी जाती है | गादी\, तकिया एवं चरणचौकी पर लाल रंग की मखमल की बिछावट की जाती है | \nवस्त्र:- सब हरी सलीदार जरी के-चागदार बागा\,चोली\,सुथन\, पटका\, चीरा आवे।ठाड़े वस्त्र लाल। पिछवाई सिलमा सितारा की। \nआभरण:- श्रीमस्तक पर हरे रंग की सलीदार ज़री के चीरा (ज़री की पाग) के ऊपर अनारदाना को पट्टीदार सिरपैंच (दोनों ओर मोती की माला से सुसज्जित)\, पन्ना की लूम\, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं | \nश्रृंगार बनमाला के।माणक की प्रधानता । त्रवल नही टोडर आवे।कर्ण फूल चार माणक के।श्रीमस्तक पे मोर चन्द्रिका सादा।वेण वेत्र माणक के\,एक वेत्र पन्ना को।पट हरो \,गोटी सोना की शतरंज ।आरसी लाल मखमल की।हीरा को चौखटा आवे। \nआरती के बाद श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े करके\,छेड़ान के श्रृंगार करने।लूम तुर्रा सुनहरी। \nफीका में चालनी(तले हुए सूखे मेवे)रसोई में केसर युक्त पेठा\,मीठी सेव आदी अरोगे।अधकि में रवा की खीर अरोगे। गोपी वल्लभ में केसरी चंद्रकला। \nमंगला – गोकुल गोधन पूजही \nराजभोग – गोवर्धन पूजा कर गोविन्द \nआरती – खेलन को सब गांग बुलाई \nशयन – दीपदान दे हटरी बैठे \nपोढवे – रचित रुचिर तर सेज बनाई \nSeva kram  courtesy: Shrinathji Temple Nathdwara Management |  \nकई बार दिवाली चतुर्दशी को आने से धन तेरस के शृंगार क्रम वत्स द्वादशी को\, रूप चतुर्दशी के शृंगार क्रम त्रयोदशी को लिए जाते है | परंतु रूप चतुर्दशी का अभ्यंग क्रम चतुर्दशी – दीपावली के दिन ही लिया जाता है |  \nधन त्रयोदशी से देव प्रबोधिनी एकादशी के पद
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-13/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251018
DTEND;VALUE=DATE:20251019
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121537Z
LAST-MODIFIED:20250722T121537Z
UID:30723-1760745600-1760831999@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 12
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-12/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251017
DTEND;VALUE=DATE:20251018
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121536Z
LAST-MODIFIED:20250722T121536Z
UID:30721-1760659200-1760745599@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 11
DESCRIPTION:रमा एकादशी व्रतम्।
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-11/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251016
DTEND;VALUE=DATE:20251017
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121534Z
LAST-MODIFIED:20250722T121534Z
UID:30719-1760572800-1760659199@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 10
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-10/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251015
DTEND;VALUE=DATE:20251016
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121531Z
LAST-MODIFIED:20250722T121531Z
UID:30717-1760486400-1760572799@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 9
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-9/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251014
DTEND;VALUE=DATE:20251015
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121528Z
LAST-MODIFIED:20250722T121528Z
UID:30715-1760400000-1760486399@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 8
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-8/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251013
DTEND;VALUE=DATE:20251014
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121523Z
LAST-MODIFIED:20250722T121523Z
UID:30713-1760313600-1760399999@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 7
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-7/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251012
DTEND;VALUE=DATE:20251013
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121517Z
LAST-MODIFIED:20250722T121517Z
UID:30711-1760227200-1760313599@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 6
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-6/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251011
DTEND;VALUE=DATE:20251012
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121513Z
LAST-MODIFIED:20250722T121513Z
UID:30709-1760140800-1760227199@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 5
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-5/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251010
DTEND;VALUE=DATE:20251011
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121510Z
LAST-MODIFIED:20250722T121510Z
UID:30707-1760054400-1760140799@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 4
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-4/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251009
DTEND;VALUE=DATE:20251010
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121507Z
LAST-MODIFIED:20250722T121507Z
UID:30705-1759968000-1760054399@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 3
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-3/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251008
DTEND;VALUE=DATE:20251009
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121504Z
LAST-MODIFIED:20250722T121504Z
UID:30703-1759881600-1759967999@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 2
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-2/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251007
DTEND;VALUE=DATE:20251008
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121500Z
LAST-MODIFIED:20250722T121500Z
UID:30701-1759795200-1759881599@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 15
DESCRIPTION:कार्तिक स्नानारम्भ
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-15/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251006
DTEND;VALUE=DATE:20251007
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121458Z
LAST-MODIFIED:20250922T064245Z
UID:30699-1759708800-1759795199@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 14
DESCRIPTION:शरद पूर्णिमा | रासोत्सव |\nसेवा क्रम :\nआश्विन शुक्ल पूर्णिमा को शरद का श्रृंगार श्वेत एवं सुनहरी ज़री के वस्त्र मुकुट एवं आभरण हीरा मोती के धराये जाते हैं | एवं स्वामिनीजी के भाव से शरद की सज्जा की जाती है | महारास के चित्रांकन की पिछवाई धरी जाती है | \nआज प्रभु को नियम का रास का चौथा मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जाता है | आज के वस्त्र श्रृंगार सर्व सखियों के अद्भुत भावों से धराये जाते हैं | \nमेघश्याम चोली यमुनाजी के भाव से\, ऊपर की रूपहरी ज़री की काछनी स्वामिनीजी के भाव से\, नीचे की सुनहरी ज़री की काछनी चन्द्रावलीजी के भाव से\, सूथन कुमारिकाजी के भाव से एवं लाल पीताम्बर (रास-पटका) अनुराग भावरूप ललिताजी के भाव से धराया जाता है | \nआज प्रभु को पीठिका पर रूपहरी ज़री का दत्तु ओढाया जाता है | \nसभी द्वार में हल्दी से डेली बनाई जाती है \,आसापाला के पत्तो की बन्दर वाल बांधी जाती है।चंदन \,आंवला\, फुलेल से अभ्यंग होव। \nसाज :- “द्वे द्वे गोपी बीच बीच माधौ” अर्थात दो गोपियों के बीच माधव श्री कृष्ण खड़े शरद-रास कर रहें हैं | ऐसी महारासलीला के अद्भुत चित्रांकन से सुसज्जित पिछवाई आज श्रीजी में धरायी जाती है | गादी\, तकिया और चरणचौकी पर सफेद लट्ठा की बिछावट की जाती है | \nवस्त्र:- छोटी काछनी व सुथन सुनहरी जरी की।बड़ी काछनी रूपहरी। चोली मेघ स्याम दरियाई(रेशम)की।पीताम्बर लाल दरियाई को।ठाड़े वस्त्र सफ़ेद डोरिया के ।पिछवाई चित्राम की महारास के भाव की। पीठक पे जरी को रूपहरी दत्तू ओढ़े। मंगला में स्वेत उपरना धरावे। आज चोटीजी नहीं आवे। गादी तकिया सब सफेद लट्ठा के। \nआभरण:- सब उत्सव के।हीरा की प्रधानता चोटिजी।मुकूट टोपी हीरा की।चोटी जी नहीं आवे।वेणु वेत्र हीरा के।। आरसी श्रृंगार में चार झाड़ की\, राजभोग में शरद की डाड़ी की। पट उत्सव को गोटी जड़ाऊ।हीरा को चौखटा आवे। \nसामग्री:- मानोर के नग को \,दूध घर की केसर यक्त बासोदि की हाडी। रसोई में केसर युक्त पेठा\, मीठी सेव\,स्याम खटाई\, कचहरिया आदि। \nविशेष:- आनोसर में सफेदी बिछे। बीच मे सांगामची पधरानी। पटिया पे आनोसर भोग आवे। भोग में फैनी\,गुजिया\,कचोरी\,दही बड़ा\,दूध घर को साज(बासोदि\,पेड़ा\, बर्फी\,खट्टे-मीठे दही\, दूध पूड़ी आदि)\,शाग घर की सामग्री\,सभी तरह के फल\, तले मेवा आदी। \nमंगला – मान लाग्यो गिरधर गावे \nराजभोग – बन्यो रास मण्डल \nआरती – वृंदावन अद्भुत नभ देखियन \nशयन – पूरी पुरन मासी\, श्याम सजनी शरद रजनी\, \nमण्डल मद रंग भरे\, लाल संग रास रंग\, \nबन्यो मोर मुकुट\, श्याम नवल नवल बधु\, \nनिर्तत रास रंगा\, खेलत रास रसिक नागर\, \nऐ रैन रीझी हो प्यारे\, बन्सी बट के निकट\, \nशरद सुहाई हो ज़ामिन\, राजत रंग भीनी \nऔर भी केदारो-बिहाग के पद गावे। मान व पोढवे के पद नहीं होवे । \nSeva kram courtesy: Shrinathji Temple Nathdwara Management | \nशरद पूर्णिमा के पद : https://vrajdwar.org/hi/adhyayan/padhya-sahitya/
URL:https://vrajdwar.org/tithi/aso-sud-14/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251005
DTEND;VALUE=DATE:20251006
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121456Z
LAST-MODIFIED:20250722T121456Z
UID:30697-1759622400-1759708799@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 13
DESCRIPTION:श्री बालकृष्णजीको पाटोत्सव  | बालकृष्णजी की लीला भावना\, स्वरूप भावना\, इतिहास जानने के लिए हमारे गध्य साहित्य के निधि स्वरूप नामक ई-बुक को पढे |  Nidhi Swaroops
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-13/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251004
DTEND;VALUE=DATE:20251005
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121454Z
LAST-MODIFIED:20250722T121454Z
UID:30695-1759536000-1759622399@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 12
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-12/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251003
DTEND;VALUE=DATE:20251004
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121452Z
LAST-MODIFIED:20250722T121452Z
UID:30693-1759449600-1759535999@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 11
DESCRIPTION:पाशांकुशा एकादशी व्रतम् ।
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-11/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251002
DTEND;VALUE=DATE:20251003
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T122333Z
LAST-MODIFIED:20250922T064103Z
UID:30870-1759363200-1759449599@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 10
DESCRIPTION:दशहरा (विजयादशमी) । सरस्वती विसर्जनम् ।\nप्रथम विलास के दिन जो माटी के १० मिट्टी के बर्तन मे बीज रोपण होता है | १० दिन तक यह बीज की वृद्धि होती है जो हमारे भाव की वृद्धि के भाव से है | इन नों दिनों मे हुई अंकुर की वृद्धि नवधाभक्ति मे वृद्धि के भाव से है | जव का चिन्ह श्री स्वामीनिजी के श्री चरण मे है जो नवधा भक्ति का सुचन करता है | नों दिनों मे हुए अंकुर की वृद्धि को लाल धागे (जो प्रेम लक्षणा भक्ति के भाव से है)से बांध कर (अर्थात नवधा भक्ति मे से ही प्रेम लक्षणा भक्ति प्राप्त की जा शक्ति है) प्रभु को धराए जाते है | प्रभु हमारे इस भाव को सहर्ष आपके श्री मस्तक पर धारण करते है |\nयह १० वर्तन १० गुण के भक्त के भाव से होते है | जो सात्विक\, राजस\, तामस से ९ गुण बनते है और १ निर्गुण इस तरह १० गुण के भक्तों के भाव से होते है |\nनव विलास \, दशहरा\, शरद पूर्णिमा के पद : https://vrajdwar.org/hi/adhyayan/padhya-sahitya/\nसेवा क्रम :\nआज दशहरा शुभ दिन नीको । विजयदशमी(दशहरा)\, \nमंगला दर्शन \nआज असत्य पर सत्य की विजय का पर्व विजयदशमी (दशहरा) है. \nश्रीजी का सेवाक्रम – पर्व रुपी उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं. \nपूरे दिन सभी समय झारीजी में यमुनाजल भरा जाता है.\nचारों समय (मंगला\, राजभोग\, संध्या व शयन) की आरती थाली में की जाती है. ऊष्णकाल में प्रभु की आरती में आरती के एक खण्ड में ही बाती लगायी जाती थी. विजयदशमी के दिन से शीत का अनुभव होने से आरती के सभी तीन खण्डों में बाती सजाई जाती है.\nगेंद\, चौगान व दीवाला सोने के आते हैं. \nउपरना रूपहरी ज़री का \nकीर्तन –मंगला दर्शन (राग : बिलावल) \nसात वरसको सांवरो बोलत है तुतरात \nआज से ही प्रतिदिन खिड़क से गौमाता पधारें इस भाव से प्रभु के सम्मुख काष्ट (लकड़ी) की गाय पधरायी जाती है. \nहल्की ठण्ड आरम्भ हो गयी है अतः आज से मंगला समय प्रभु स्वरुप की पीठिका पर दत्तु ओढाया जाता है. \nइससे श्रीजी में यह परंपरा है कि आज से एक माह तक समस्त पुष्टि-सृष्टि के वैष्णवों की ओर से सभी जीवों के कृतार्थ हेतु मंगला दर्शन उपरांत श्रीजी के श्रीचरणों में प्रतिदिन सवा लाख (1\,25\,000) तुलसी दल (पत्र) समर्पित किये जाते हैं. \nमंगला दर्शन पश्चात प्रभु को केसर युक्त चन्दन\, आवंला\, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है. \nआज से प्रभु को ज़री के वागा धराये जाने आरम्भ हो जाते हैं जो कि बसंत पंचमी से एक दिन पूर्व तक धराये जायेंगे. ठाडे वस्त्र भी दरियाई के आरम्भ हो जाते हैं. \nज़री के वस्त्र प्रभु के श्रीअंग पर चुभें नहीं इस भाव से आज से प्रतिदिन प्रभु को सामान्य वस्त्रों के भीतर आत्मसुख के वागा धराये जाते हैं.\nआत्मसुख के वागा विजयदशमी से कार्तिक शुक्ल दशमी तक (मलमल के) व कार्तिक शुक्ल (देवप्रबोधिनी) एकादशी से डोलोत्सव तक (शीत वृद्धि के अनुसार रुई के) धराये जाते हैं. \nआज निर्गुण भक्तों के भाव की सेवा है अतः श्रीजी को नियम के रुपहली ज़री के श्वेत घेरदार वागा धराये जाते हैं और श्रीमस्तक पर रुपहली ज़री की पाग पर मोरपंख की सादी चंद्रिका धरायी जाती है.\nआज श्रृंगार में विशेष यह है कि आज प्रभु के दायें श्रीहस्त में प्राचीन पन्ना की जडाऊ कटार धरायी जाती है. \nगोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से मनोर (जलेबी-इलायची) के लड्डू और विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. \nराजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.\nसखड़ी में केसरयुक्त पेठा व मीठी सेव अरोगायी जाती है. आज से राजभोग समय अरोगाये जाने वाले फीका\, थपडी के स्थान पर तले जमीकंद (सूरण\, अरबी\, रतालू व शकरकन्द) अरोगाये जाते हैं. \nशक्तिरूपेण भाव से राजभोग समय प्राचीन मगर की खाल से बनी ढाल (जिसमें स्वर्ण का अद्भुत काम किया हुआ है) को तबकड़ी पर प्रभु के सम्मुख रखा जाता है एवं राजभोग पश्चात हटा लिया जाता है. \nइसी भाव से एक दिवस पूर्व संध्या काल में प्रभु के स्वरुप के पीछे एक लकड़ी के लम्बे संदूक में विभिन्न आकारों की ढालें\, तलवारें\, अद्भुत काम से सुसज्जित कटारें\, धनुष-बाण\, चाकू आदि विभिन्न अस्त्र-शस्त्र रखे जाते हैं जिन्हें दशहरा के दिन संध्या-आरती दर्शन के उपरांत हटा लिया जाता है. \nतृतीय गृह प्रभु श्री द्वारकाधीशजी आदि कुछ पुष्टि स्वरूपों में नवरात्रि के अंतिम दिनों में अस्त्र\, शस्त्र प्रभु के सम्मुख रखे जाते हैं. \nराजभोग दर्शन – \nकीर्तन – (राग : नट बिलावल) \nआन और आन कहत भेचक रहत व्रजनारी नर l\nकटु तिकत आम्ल मधुर खारे सलोने प्रकार खटरसको प्रीतसों आरोगत सुन्दरवर ll 1 ll\nगिरिराज बरन बरन शिला जु सहस्त्रन मोदक ठोर ठोर बेसन गुंजा बाबरन l\n‘राजाराम’के प्रभु को अचवावन कारन इन्द्र झारी भर लायो जलधर ll 2 ll \nसाज – आज श्रीजी में हरे रंग के आधार वस्त्र पर पुष्प-पत्रों की लता के सुरमा-सितारा के कशीदे के ज़रदोज़ी के भरतकाम वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी\, तकिया और चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है. \nवस्त्र – श्रीजी को आज रुपहली ज़री का सूथन\, चोली एवं घेरदार वागा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र गहरे हरे दरियाई के धराये जाते हैं. पटका सुनहरी ज़री का धराया जाता है. \nश्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. माणक की प्रधानता एवं जड़ाव सोने के आभरण धराये जाते हैं.\nश्रीमस्तक पर चीरा (रुपहली ज़री की पाग) के ऊपर माणक का पट्टीदार सिरपैंच\, लूम\, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.\nकिलंगी नवरत्न की धराई जाती हैं.\nस्वर्ण का जड़ाव का चौखटा पीठिका के ऊपर धराया जाता है.\nकली\, कस्तूरी वल्लभी आदि माला धरायी जाती हैं.\nश्रीकर्ण में चार कर्णफूल धराये जाते हैं. गुलाब एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.\nश्रीहस्त में कमलछड़ी\, माणक के वेणुजी एवं वेत्रजी (एक हीरा का) धराये जाते हैं.\nदायें श्रीहस्त में ही आज विशेष रूप से पन्ने की कटार (श्री मुरलीधरजी वाली) धरायी जाती है.\nपट रुपहली ज़री का व गोटी चांदी की आती है.\nआरसी शृंगार में चार झाड़ की एवं राजभोग में सोना की दिखाई जाती है.\nगिरिधरलाल जवारे बांधत बन्यो है भाल कुंकुम को टीको ।।१।।\nआरती करत देत न्यौछावर चिरज़ीयो लाल भामतो जीको।\nआसकरन प्रभु मोहन नागर त्रिभुवन को सुख लागत फीको ।।२।। \nआज से अन्नकूट महायज्ञ की झांझ की बधाई बैठती है. अन्नकूट के कीर्तन गाये जाते हैं. अन्नकूट की सामग्री के निर्माण के प्रारंभ हेतु बालभोग का भट्टी-पूजन किया जाता है एवं श्रीजी के मुखियाजी प्रभु के मुख्य बालभोगिया को बीड़ा देकर अनसखड़ी की सेवा प्रारम्भ करने की आज्ञा देते हैं. \nनवरात्री के प्रथम दिन बोये जवारा उत्थापन समय सिद्ध कर लिए जाते हैं.\nसायंकाल भोग के दर्शन में श्रीजी को तिलक\, अक्षत किया जाता है\, बीड़ा पधराये जाते हैं.\nप्रभु के श्रीमस्तक पर पहले से धरायी मोर चन्द्रिका को बड़ा (हटा) कर उसके स्थान पर सिद्ध जवारा में से उत्तमोत्तम जवारा स्वर्ण की अंगूठीनुमा कड़ी में रेशमी डोरे से बांध\, कलंगी बना कर धराये जाते हैं.\nइस दौरान झालर-घंटा\, शंखादी बजाये जाते हैं और धूप-दीप किये जाते हैं. चरणारविन्द में तुलसी व जवारा समर्पित किये जाते हैं और मुठियाँ वार के चांदी की थाली में आरती की जाती है. \nजवारा धरावे तब यह पद गाया जाता है. \nआज दशहरा शुभ दिन नीको ।\nगिरिधरलाल जवारे बांधत बन्यो है भाल कुंकुम को टीको ।।१।।\nआरती करत देत न्यौछावर चिरज़ीयो लाल भामतो जीको।\nआसकरन प्रभु मोहन नागर त्रिभुवन को सुख लागत फीको ।।२।। \nतदुपरांत संध्या-आरती के भोग में श्रीजी को उत्सव भोग अरोगाये जाते हैं.\nउत्सव भोग में विशेष रूप से 10 माट अरोगाये जाते हैं जो कि दस प्रकार के भक्तों की भावना से अरोगाये जाते हैं. इसके संग बीज चालनी का सूखा मेवा\, कच्चर व दूधघर में सिद्ध बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.\nप्रत्येक माट का वजन लगभग 20 किलो होता है और वर्ष भर में केवल आज के दिन ही अरोगाये जाते हैं. \nआज भोग समय श्रीजी को अरोगाये जाने वाले फीका के स्थान पर घी में तले बीज-चालनी का सूखा मेवा अरोगाया जाता है व आरती में अरोगाये जाने वाले ठोड के स्थान पर बूंदी के बड़े लड्डू अरोगाये जाते हैं.\nशाकघर में सिद्द मावे का मेवा मिश्रित माट भी आज ठाकुरजी को अरोगाये जाते हैं. \nआज सायंकाल संध्या-आरती दर्शन पश्चात श्रीजी में अश्व पूजन होता है. श्रीकृष्ण भण्डार के अधिकारीजी श्री महाप्रभुजी की बैठक के चौक में श्रीजी के मुख्य पंड्याजी श्रीनाथ गार्ड्स की उपस्थिति में मंत्रोच्चार के मध्य मन्दिर पलटन के अश्वों का पूजन करते हैं एवं मुख्य कमांडिंग ऑफिसर\, अश्वचालक को वस्त्र आदि प्रदान करते हैं. \nसंध्या-आरती दर्शन उपरांत प्रातः धराये श्रीकंठ के आभरण बड़े कर छेड़ान के श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर मोती की लूम व किलंगी में नए जवारा धराये जाते हैं. \nआज से श्रीजी में शयन के दर्शन बाहर खुलना प्रारंभ हो जाते हैं जो कि आगामी मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी (नित्यलीलास्थ श्री गोकुलनाथजी के उत्सव के एक दिन पूर्व) तक अर्थात लगभग 55 दिन तक प्रतिदिन सायंकाल लगभग 7 बजे होंगे. \nआज से लगभग 35 दिन तक प्रतिदिन सायंकाल कमलचौक में मानसीगंगा के दीपवृक्ष (आकाशदीप) की स्थापना की जाती है. ऐसी मान्यता है कि इसमें दीप प्रज्वलित करने से बालकों पर अनिष्ट की निवृति होती है एवं अतुल्य संपत्ति एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है. इसी भाव से आज से सुदर्शन चक्रराज के समक्ष भी तिल के तेल का दीपक (आकाशदीप) प्रज्वलित किया जाता है. Source : Shrinathji Temple Management\n: facebook page : Shreenathji Nity darshan
URL:https://vrajdwar.org/tithi/aso-sud-10/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251001
DTEND;VALUE=DATE:20251002
DTSTAMP:20260501T105905
CREATED:20250722T121449Z
LAST-MODIFIED:20250922T063855Z
UID:30689-1759276800-1759363199@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 9
DESCRIPTION:नवमो विलास \nमुख्य सखी : श्री लाडिली जी – स्वामिनी जी\nरास की स्थली : बंसीबट\nवस्त्र के रंग : केसरी\nमख्य सामग्री : पुआ की सामग्री \nनव विलास \, दशहरा\, शरद पूर्णिमा के पद : https://vrajdwar.org/hi/adhyayan/padhya-sahitya/
URL:https://vrajdwar.org/tithi/aso-sud-9/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20250930
DTEND;VALUE=DATE:20251001
DTSTAMP:20260501T105906
CREATED:20250722T121447Z
LAST-MODIFIED:20250922T063733Z
UID:30687-1759190400-1759276799@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 8
DESCRIPTION:आठमो विलास \nसखी : श्री भावनीजी \nसामग्री : लड़ुआ \nस्थली : भद्रवन \nरंग : जांबली \nनव विलास \, दशहरा\, शरद पूर्णिमा के पद : https://vrajdwar.org/hi/adhyayan/padhya-sahitya/
URL:https://vrajdwar.org/tithi/aso-sud-8/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20250929
DTEND;VALUE=DATE:20250930
DTSTAMP:20260501T105906
CREATED:20250722T121443Z
LAST-MODIFIED:20250922T063526Z
UID:30685-1759104000-1759190399@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 7
DESCRIPTION:सातमों विलास \nसखी : श्री कृष्णावतीजी \nसामग्री : गुंजा \nस्थली : गहवर वन \nरंग : गुलाबी \nनव विलास \, दशहरा\, शरद पूर्णिमा के पद : https://vrajdwar.org/hi/adhyayan/padhya-sahitya/
URL:https://vrajdwar.org/tithi/aso-sud-7/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20250928
DTEND;VALUE=DATE:20250929
DTSTAMP:20260501T105906
CREATED:20250722T121437Z
LAST-MODIFIED:20250922T063355Z
UID:30683-1759017600-1759103999@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 6
DESCRIPTION:सरस्वती पूजनारम्भः । छठ्ठो विलास | \nसखी : श्री मुखराइजी \nसामग्री : श्रीखंड \nस्थली : गोवर्धन वन \nरंग : श्याम \nनव विलास \, दशहरा\, शरद पूर्णिमा के पद : https://vrajdwar.org/hi/adhyayan/padhya-sahitya/\
URL:https://vrajdwar.org/tithi/aso-sud-6/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20250927
DTEND;VALUE=DATE:20250928
DTSTAMP:20260501T105906
CREATED:20250722T121431Z
LAST-MODIFIED:20250922T063242Z
UID:30681-1758931200-1759017599@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन शुक्लपक्ष 5
DESCRIPTION:पाँचमों विलास \nसखी : श्री संजीवलीजी \nसामग्री : संजाब की खीर \nस्थली : कदली वन \nरंग : आसमानी \nनव विलास \, दशहरा\, शरद पूर्णिमा के पद : https://vrajdwar.org/hi/adhyayan/padhya-sahitya/
URL:https://vrajdwar.org/tithi/aso-sud-5/
END:VEVENT
END:VCALENDAR