BEGIN:VCALENDAR
VERSION:2.0
PRODID:-//Vraj Dwar - ECPv6.15.20//NONSGML v1.0//EN
CALSCALE:GREGORIAN
METHOD:PUBLISH
X-ORIGINAL-URL:https://vrajdwar.org
X-WR-CALDESC:Events for Vraj Dwar
REFRESH-INTERVAL;VALUE=DURATION:PT1H
X-Robots-Tag:noindex
X-PUBLISHED-TTL:PT1H
BEGIN:VTIMEZONE
TZID:Asia/Kolkata
BEGIN:STANDARD
TZOFFSETFROM:+0530
TZOFFSETTO:+0530
TZNAME:IST
DTSTART:20240101T000000
END:STANDARD
END:VTIMEZONE
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251107
DTEND;VALUE=DATE:20251108
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121557Z
LAST-MODIFIED:20250722T121557Z
UID:30762-1762473600-1762559999@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक कृष्णपक्ष 2
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-2/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251106
DTEND;VALUE=DATE:20251107
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121556Z
LAST-MODIFIED:20250722T121556Z
UID:30760-1762387200-1762473599@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक कृष्णपक्ष 1
DESCRIPTION:व्रतचर्या अथवा गोपमासारम्भः ।
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-1/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251105
DTEND;VALUE=DATE:20251106
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121555Z
LAST-MODIFIED:20250722T121555Z
UID:30758-1762300800-1762387199@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 15
DESCRIPTION:चातुर्मास्य तथा कार्तिक के नियम की समाप्तिः । गोपमासारम्भः ।
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-15/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251104
DTEND;VALUE=DATE:20251105
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121554Z
LAST-MODIFIED:20250722T121554Z
UID:30756-1762214400-1762300799@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 14
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-14/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251103
DTEND;VALUE=DATE:20251104
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121553Z
LAST-MODIFIED:20250722T121553Z
UID:30754-1762128000-1762214399@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 13
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-13/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251102
DTEND;VALUE=DATE:20251103
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121552Z
LAST-MODIFIED:20250722T121552Z
UID:30752-1762041600-1762127999@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 11
DESCRIPTION:प्रबोधिनी एकादशी व्रतम् देवोत्थापनं सायं -संध्या  में।  श्री गुसांईजी के प्रथम लालजी श्री गिरधरजी को उत्सव (1597) तथा पंचम लालजी श्री रघुनाथजी को उत्सव (1611) | द्वादशी को क्षय होयवे सु आज | \nजालर घंटा से देवोत्थापन किया जाएगा | \nसाज मे आज गन्ने से मंडप का निर्माण होगा | १६ गन्नों से एक जोड़ एसी ४ जोड़ लाल दोरी से एक दूसरे के साथ कुछ इस तरह बांधी जाएगी जिससे मंडप मे से प्रभु के दर्शन हो शके | मंडप की चारों ओर बास की टोकरी मे गन्ने के टूक \, शकरकंद \, बैंगन \, भाजी धरी जाएगी |\nप्रभु श्री बालकृष्णजी को पंचामृत स्नान होगा फिर अभ्यंग किया जाएगा |  \nसेवा क्रम :  \nआज अन्नकूट के वस्त्र\, श्रृंगार ही होवे। पुरे दिन तुलसी की माला आवे। भोग आरती में तुलसी की गोवर्धन माला आवे। \nवस्त्रः- चागदार बागा\, चोली\, कूल्हे सब फुलकशाही\, रूपहरी जरी के। सुथन लाल सलीदार जरी की। पटका सुनहरी जरी को। ठाड़े वस्त्र अमरसी। गोकर्ण लाल जरी के। पिछवाई चितराम की\, बड़ी गायन की। अब शीतकाल में चितराम की पिछवाई नहीं आवे। \nआभरणः- श्रृंगार दो जोड़ी के। एक माणक की\, एक पन्ना की। सब आभरण को मेल अन्नकूट जेसो मिलानो। टोडर\, त्रवल दोनों आवे। चोटीजी धरावे। बनमाला को श्रृंगार। कस्तूरी\, कली आदी सब आवे। श्रीमस्तक पे पांच मोर चन्द्रिका को जोड़ धरावे। वेणुजी हीरा के\, वेत्र एक हिरा को\, एक सोना को। पट नित्य को\, गोटी जडाऊ। \nआरती पीछे श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े करके\, छेड़ान के श्रृंगार करने। कूल्हे रहे जासु लूम तुर्रा नहीं आये। पिछवाई फुलक शाही जरी की धरावे। \nशयन भोग में पेठा बड़ी को शाग अरोगे। केसर युक्त पेठा आवे। \nमंगला – प्रथम गौचारण चले गोपाल  \nराजभोग – सोहत लाल लकूट कर राती  \nशयन – कैसे कैसे गाय चराई  \nपोढवे – राय गिरधरन संग राधिका रानी\nआज के दिन सेवा मे प्रभु श्रीनाथजी सन्मुख विवाह के पद एवं सेहरा के पद गाए जाएंगे |\nSeva kram  courtesy: Shrinathji Temple Nathdwara Management |  \nधन त्रयोदशी से देव प्रबोधिनी एकादशी के पद
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-11/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251101
DTEND;VALUE=DATE:20251102
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121551Z
LAST-MODIFIED:20250722T121551Z
UID:30750-1761955200-1762041599@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 10
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-10/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251031
DTEND;VALUE=DATE:20251101
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121549Z
LAST-MODIFIED:20250722T121549Z
UID:30748-1761868800-1761955199@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 9
DESCRIPTION:अक्षय नवमी | कृत युगादि । कृष्माण्डदानम् ।  अक्षय नवमी |  कृत युगादि \nजब श्री कृष्ण ने सभी बृजवासी को इन्द्र के स्थान पर गोवर्धन पूजन के लिए मनाया तब इन्द्रदेव को अभिमान आया और उन्होंने भयंकर वर्षा समग्र ब्रिजमंडल मे करी | तब श्री कृष्ण ने गोवर्धन धारण करके समग्र ब्रिज को सनाथ किया |\nतब इन्द्र देव का मान भंग हुआ और उनको भूल समज आई तब उनकी माता ने उनको कहा की श्री कृष्ण से क्षमा मांगों और साथमे सुरभि गौमाता को ले जाओ प्रभु गौ अति प्रिय है | तब इन्द्रदेव ऐरावत और सुरभि माता के साथ  प्रभु के शरण मे आए और क्षमा याचना की | प्रभु गौ और इंद्रिय के स्वामी है तब से प्रभु का एक और नाम हुआ  “गोविंद” | इन्द्र देव ने सुरभि गौ माता के दूध से और ऐरावत द्वारा जल अभिषेक से  “गोविंदाभिषेक” किया  | उस अभिषेक से एक कुंड की रचना हुई जो  “गोविंद कुंड’ से प्रचलित हुआ | \nतद पश्चात से एसा भी कहा गया है की इन्द्र देव ने प्रभु के एक स्वरूप श्री गोकुलनाथजी स्वरूप की सेवा की जो आज के समय मे गोकुल मे बिराजमान है |  इंद्रमान भंग के पद :  धन त्रयोदशी से देव प्रबोधिनी एकादशी के पद
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-9/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251030
DTEND;VALUE=DATE:20251031
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121548Z
LAST-MODIFIED:20250722T121548Z
UID:30746-1761782400-1761868799@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 8
DESCRIPTION:गोपाष्टमी \nमंगला दर्शन उपरांत प्रभु को चन्दन\, आवंला\, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है. \nपिछवाई श्याम आधारवस्त्र पर खण्डों में कशीदे की श्वेत गायों की आती है.\nगौचारण के भाव से आज प्रभु को नियम का मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जाता है. \nमुकुट के इस श्रृंगार  प्रभु को मुख्य रूप से तीन लीलाओं शरद-रास\, दान और गौ-चारण के भाव से मुकुट का श्रृंगार धराया जाता है.  \nइस उपरांत निकुँज लीला में भी मुकुट धराया जाता है. मुकुट उद्बोधक है एवं भक्ति का उद्बोधन कराता है. \nआज इस ऋतु में मुकुट-काछनी का श्रृंगार अंतिम बार धराया जायेगा.\nशीतकाल में मान आदि की लीलाएँ होती है परन्तु रासलीला नहीं होती अतः मुकुट नहीं धराया जाता.  \nआज से तीन दिन तक आठों समय में गौ-चारण लीला के कीर्तन गाये जाते हैं.\nवस्त्र में काछनी लाल व हरी छापा की धरायी जाती है. \nगोपाष्टमी के कारण आज श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में मनोर (जलेबी-इलायची) के लड्डू\, दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.  \nराजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता भोग लगाया जाता है. सखड़ी में केशरयुक्त पेठा\, मीठी सेव व दहीभात अरोगाये जाते हैं व संजाब (गेहूं के रवा) की खीर अरोगायी जाती है. \nराजभोग दर्शन – \nकीर्तन – (राग : सारंग) \nगोपाल माई कानन चले सवारे l\nछीके कांध बाँध दधि ओदन गोधन के रखवारे ll 1 ll\nप्रातसमय गोरंभन सुन के गोपन पूरे श्रृंग l\nबजावत पत्र कमलदल लोचन मानो उड़ चले भृंग ll 2 ll\nकरतल वेणु लकुटिया लीने मोरपंख शिर सोहे l\nनटवर भेष बन्यो नंदनंदन देखत सुरनर मोहे ll 3 ll\nखगमृग तरुपंछी सचुपायो गोपवधू विलखानी l\nविछुरत कृष्ण प्रेम की वेदन कछु ‘परमानंद’ जानी ll 4 ll \nसाज – आज श्रीजी में श्याम आधारवस्त्र पर खण्डों में गायों के कशीदा वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी\, तकिया के ऊपर लाल एवं चरणचौकी के ऊपर हरी बिछावट की जाती है. \nवस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग का रेशमी सूथन\, मेघश्याम दरियाई वस्त्र की चोली एवं हरे छापा की बड़ी काछनी  व लाल छापा की छोटी काछनी धरायी जाती है. लाल दरियाई वस्त्र का रास-पटका (पीताम्बर) धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र सफेद जामदानी (चिकने लट्ठा) के धराये जाते हैं. \nश्रृंगार – श्रीजी को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. हीरे की प्रधानता सहित पन्ना\, माणक एवं जड़ाव सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं.\n श्रीमस्तक पर हीरा की टोपी पर सोने का जड़ाव का मुकुट एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में हीरा के मयूराकृति कुंडल धराये जाते हैं. आज (चोटी) नहीं धरायी जाती है.\nश्रीकंठ में माला\, दुलड़ा हार आदि धराये जाते हैं. कली\, कस्तूरी की माला धरायी जाती है.\nपीले एवं लाल पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.\n श्रीहस्त में कमलछड़ी\, हीरा के वेणुजी दो वेत्रजी धराये जाते हैं.\nपट काशी का व गोटी सोना की कूदते हुए बाघ बकरी की आती है.\nआरसी शृंगार में चार झाड़ की एवं राजभोग में सोना की डांडी की दिखाई जाती हैं. \nआज गोपाष्टमी से फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा (होलिका दहन) तक संध्या-आरती में प्रतिदिन श्रीजी को शाकघर में विशेष रूप से सिद्ध गन्ने के रस की एक डबरिया (छोटा बर्तन) अरोगायी जाती है. इस अवधि में कुछ बड़े उत्सवों पर इस रस में कस्तूरी भी मिश्रित होती है. \nआज संध्या-आरती दर्शन में छोटा वैत्र श्रीहस्त में धराया जाता है. \nदशहरा के दिन से प्रभु के सम्मुख काष्ट (लकड़ी) की गौमाता आती है जो आज संध्या-आरती दर्शन उपरांत विदा होती है.   \nप्रातः धराये मुकुट\, टोपी और दोनों काछनी संध्या-आरती दर्शन उपरांत बड़े कर दिए जाते हैं और शयन दर्शन में मेघश्याम चाकदार वागा धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लाल कुल्हे व तनी धराये जाते हैं. आभरण छेड़ान के (छोटे) धराये जाते हैं. \nधन त्रयोदशी से देव प्रबोधिनी एकादशी के पद
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-8/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251029
DTEND;VALUE=DATE:20251030
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121547Z
LAST-MODIFIED:20250722T121547Z
UID:30744-1761696000-1761782399@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 7
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-7/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251028
DTEND;VALUE=DATE:20251029
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121546Z
LAST-MODIFIED:20250722T121546Z
UID:30743-1761609600-1761695999@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 6
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-6-2/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251027
DTEND;VALUE=DATE:20251028
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121545Z
LAST-MODIFIED:20250722T121545Z
UID:30741-1761523200-1761609599@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 6
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-6/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251026
DTEND;VALUE=DATE:20251027
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121544Z
LAST-MODIFIED:20250722T121544Z
UID:30739-1761436800-1761523199@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 5
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-5/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251025
DTEND;VALUE=DATE:20251026
DTSTAMP:20260501T094537
CREATED:20250722T121543Z
LAST-MODIFIED:20250722T121543Z
UID:30737-1761350400-1761436799@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 4
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-4/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251024
DTEND;VALUE=DATE:20251025
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121542Z
LAST-MODIFIED:20250722T121542Z
UID:30735-1761264000-1761350399@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 3
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-3/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251023
DTEND;VALUE=DATE:20251024
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121542Z
LAST-MODIFIED:20250722T121542Z
UID:30733-1761177600-1761263999@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 2
DESCRIPTION:यम द्वितीया (भाईदूज)। \nआज सभी द्वार में हल्दी से डेली माड़ी जाती है।व बन्दर वाल बाँधी जाती है।थाली की आरती।आरसी चार झाड़ की।बंटा\,कुंजा\,तकिया जडाऊ। \nवस्त्र:- घेरदार बागा\,चोली\,सुथन सब लाल खिनखाब के।चीरा सुनहरी\,फुलक साही जरी को।पटका रूपहरी जरी को\,एक छोर आगे\,एक बगल को।ठाड़े वस्त्र चिकने(लट्ठा)के।पिछवाई लाल \,मोतीं के काम की\,नि. ली.गोस्वामी श्री गोवर्धन लाल जी महाराज की। \nआभरण:- श्रंगार हल्के। आभरण सब पन्ना के\, उत्सव के।चार माला\,चीरा पे सिरपेच की जगह पन्ना धरावे।वाके ऊपर नीचे मोतीं की माला धरावे।श्री कर्ण में पन्ना के कर्णफूल एक जोड़ी।श्रीमस्तक पे एक मोर चन्द्रिका सादा।वेणु वेत्र हीरा के। \nश्रीमस्तक पर सुनहरी फुलक शाही ज़री की पाग (चीरा) के ऊपर सिरपैंच के स्थान पर पन्ना\, जिसके ऊपर नीचे मोती की लड़\, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं | \nराजभोग के आगे के भोग धरके राजभोग की माला धरावे।दंडवत करे।झालर\,घंटा\,शंख\,नोबत बजे \,फिर श्री के तिलक होवे।बीड़ा\,तुलसी समर्पे।फिर सब स्वरूप को तिलक होवे।चार मुठिया वार के चुन की आरती होवे।न्योछावर होवे।फिर आप श्री के और आप श्री \,सब सेवकन के तिलक करे।   \nबहन सुभद्रा के घर भोजन अरोगें इस भाव से प्रभु आज राजभोग अरोगते हैं | \nआरती पीछे श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े होवे।लूम तुर्रा सुनहरी। \nगोपी वल्लभ कुर के पके गूंजा।फिका में चालनी। \nमंगला – लीला लाल गोवर्धनधर की  \nराजभोग – महिमा में जानी अब न छडो  \nआरती – कान्ह कुँवर के कर पल्लव  \nशयन – राजे गिरिराज आज  \nमान – आली री मान गढ  \nपोढवे – सोवत नींद आय गई \nराजभोग समय तिलक होवे – आज दूज भैय्या की कहियत कर लिये कंचन थाल \nSeva kram  courtesy: Shrinathji Temple Nathdwara Management |  \nधन त्रयोदशी से देव प्रबोधिनी एकादशी के पद
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-2/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251022
DTEND;VALUE=DATE:20251023
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121541Z
LAST-MODIFIED:20250722T121541Z
UID:30731-1761091200-1761177599@vrajdwar.org
SUMMARY:कार्तिक शुक्लपक्ष 1
DESCRIPTION:गुर्जराणां 2082 वर्षारम्भः ।
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-1/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251021
DTEND;VALUE=DATE:20251022
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121540Z
LAST-MODIFIED:20250722T121540Z
UID:30729-1761004800-1761091199@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 30
DESCRIPTION:अन्नकूटोत्सव | गोवर्द्धन पूजा । \nगोवर्धन पूजा\, अन्नकूट महोत्सव \nअन्नकूट कोटिन भांतनसो भोजन करत गोपाल ।\nआपही कहत तात अपनेसों गिरि मूरति देखो तत्काल ।।१।।\nसुरपति से सेवक इनही के शिव विरंची गुण गावे ।\nइनहीते अष्ट महा सिध्धि नवनिधि परम पदारथ पावे ।।२।।\nहम गृह बसत गोधन बन चारत गोधन ही कुलदेव ।\nइने छांड जो करत यज्ञ विधि मानो भींतको लेव ।।३।।\nयह सुन आनंदे ब्रजवासी आनंद दुंदुभी बाजे ।।\nघरघर गोपी मंगल गावे गोकुल आन बिराजे ।।४।। \nमंगला दर्शन उपरांत डोल-तिबारी में अन्नकूट भोग सजाये जाने प्रारंभ हो जाते हैं अतः अन्य सभी समां के दर्शन भीतर होते हैं. दिन भर का पूरा सेवाक्रम भीतर होता रहता है. \nराजभोग दर्शन – \nसाज – श्रीजी में सर्व साज दीपावली के दिवस धरा हुआ ही आज भी धराया जाता है. \nवस्त्र – श्रीजी को आज दीपावली के दिवस धरे गये श्वेत ज़री के वस्त्र ही धराये जाते हैं.  \nश्रृंगार वृद्धि में राजभोग के पश्चात ऊर्ध्व भुजा की ओर लाल रंग का ज़री का बिना तुईलैस किनारी बिना का पीताम्बर धराया जाता है जिनके दो अन्य छोर चौखटे के ऊपर रहते हैं.\nऐसा पीताम्बर वर्ष में दो बार (आज के दिन व जन्माष्टमी\, नन्दोत्सव के दिन) धराया जाता है.\nजन्माष्टमी\, नन्दोत्सव के दिन यह केवल चौखटे पर धराया जाता है परन्तु आज यह श्रीहस्त में भी धराया जाता है.\nप्रभु यह पीताम्बर गायों\, ग्वालों और निजजनों पर फिरातें हैं जिससे उनको नज़र ना लगे.\nचतुर्भुजदास जी ने इस भाव का एक पद भी गाया है. \nखेली बहु खेली गाय\, बुलाई घुमर घोरी ।\nबछरा ऊपर ‘ऊपरना फेरत’ दाढ़ मेल के डोरी ।।\nआप गोपाल फ़ूक मारत है गौ सुत भरत अंकोरी ।\nघों घों करत लकुट कर लीने ‘मुख फेरत पिछोरी’ ।। \nश्रृंगार – आज अभ्यंग नहीं होता. सर्व श्रृंगार दीपावली के दिवस के ही रहते हैं.\nआज दो जोड़ी के एक माणक और एक पन्ना की प्रधानता वाले शृंगार धरे जाते हैं. दोनो हालरा नहीं धराये जाते हैं.\nकेवल श्रीमस्तक के ऊपर लाल रंग की ज़री की तुई की किनारी वाला गौकर्ण धराया जाता है.\nइसी प्रकार कुल्हे के ऊपर सिरपैंच बड़ा कर दिया जाता है और इसके बदले जड़ाव पान धराया जाता है.\nकमलछड़ी एवं पुष्प मालाजी दीपावली के दिवस के होते हैं अतः बदले जाते हैं.\nश्रीहस्त में जड़ाव सोने के वेणुजी और दो वेत्रजी धराये जाते हैं. \nराजभोग आरती होवे पीछे तिलकायतश्री मिड्ढा (चाँवल रखने का घास निर्मित कुआ) में सेव\,घी\,बुरा पधराय के महूर्त करते हैं फिर अन्नकूट के भोग धराना शुरू होते हैं.\nआज राजभोग पश्चात अनोसर नहीं होते. दोपहर लगभग 3 बजे श्रीजी के छड़ीदारजी\, समाधानीजी\, श्री कृष्ण-भण्डार के अधिकारीजी\, मुख्य निष्पादन अधिकारी\, गौशाला के ग्वाल-बाल आदि विशिष्टजन कीर्तन समाज के साथ द्वितीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी को पधराने उनके घर (मंदिर) जाते हैं.\nश्रीजी के ग्वालबाल श्रीजी मंदिर की सात परिक्रमा कर गीत गाते हुए श्री विट्ठलनाथजी के घर उन्हें गोवर्धनपूजा में आने का आमंत्रण देते हैं.\nतदुपरांत द्वितीय गृहाधीश श्री कल्याणरायजी महाराज अन्य गुसाई बालकों की अगुआई में श्री ठाकुरजी को सुखपाल में विराजित कर वैष्णवों के संग कीर्तन की स्वर लहरियों के मध्य श्रीजी में अन्नकूट अरोगाने पधराते हैं.  \nश्री विट्ठलनाथजी को श्रीजी सम्मुख विराजित कर पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री श्रीजी से आज्ञा लेकर चिरंजीवी श्री विशालबावा\, पूज्य श्री कल्याणरायजी\, श्री हरिरायजी\, श्री वागीशजी एवं उपस्थित अन्य गौस्वामी बालकों और श्रीजी के सभी मुख्य सेवकों के साथ श्री नवनीतप्रियाजी को पधारने जाते हैं. \nवहां श्री नवनीतप्रियाजी के मुखियाजी पूज्य तिलकायत व चिरंजीव विशाल बावा को टोरा बाँधते हैं.\nखासा-भण्डार के सेवक हल्दी\, गुलाल एवं अबीर से रंगोली छांटते चलते हैं जिसपर होकर पूज्य तिलकायत एवं चिरंजीव श्री विशालबावा श्री नवनीतप्रियाजी व श्रीजी के सेवकों के संग प्रभु को बीड़ा अरोगाते खुली स्वर्ण की चकडोल में विराजित कर गोवर्धन-पूजा के चौक में सूरजपोल के पावन सोपानों पर विराजित करते हैं.\nदोनों स्वरूपों के पधारने और गोवर्धन पूजन के दौरान किर्तनिया ‘चले रे गोपाल…गोवर्धन पूजन’ कीर्तन गाते रहते हैं.\nतदुपरांत गौ-माताएँ कानजगाई के दिवस की भांति ही धूमधाम से क्रीड़ा करती हुई मंदिर मार्ग को अपनी रुनझुन से निनादित करती हुई श्रीजीमंदिर के गोवर्धन-पूजा के चौक में पधारती हैं.\nप्रभु श्री नवनीतप्रियाजी को विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध केशर मिश्रित दूध की दो चपटिया (मटकी) का भोग अरोगाया जाता है और गोवर्धन-पूजा शुरु हो जाती है.\nचिरंजीव श्री विशालबावा गोवर्धन-पूजा के मध्य प्रभु को शिरा-विहीन पान अरोगाते रहते हैं.\nइस पूर्व दोपहर में गोवर्धन पूजा के चौक में गोबर से गोवर्धन का निर्माण किया जाता है जिसे सिन्दूर से रंगी लकड़ी के जाली से ढंका गया होता है.\nपूज्य तिलकायत मानसी-गंगा के जल\, दूध\, चंदन\, कूमकुम आदि विविध सामग्रियों से से लगभग पौन घंटे तक गोवर्धन-पूजा करते हैं.\nतदुपरांत टेरा लेकर श्रीगोवर्धन को विशाल टोकरों में रखे महाप्रशाद का भोग अरोगाया जाता है.\nभोग के पश्चात झालर-घण्टों और शंख की ध्वनि के मध्य आरती की जाती है.\nइसके बाद श्रीजी के दूधघर के ग्वाल\, गौशाला के बड़े ग्वाल तथा सातों घरों के ग्वालों\, पानघरिया\, फूल-घरिया\, ख़ासाभंडारी\, परछना मुखिया आदि मंदिर के विविध विभागों के प्रमुखों को तिलकायत श्री ‘टौना’ बाँध कर मठड़ी\, पान का बीड़ा व सेव लड्डू का नेग देते हैं.\nगोवर्धन-पूजा के पूर्ण होने पर श्रीनवनीतप्रियाजी बगीचे के रास्ते से होते हुए श्रीजी के सम्मुख अन्नकूट अरोगने पधारते हैं. इधर गोबर के गोवर्धन पर गौएँ चढ़ाई जाती हैं.\nगौधूली वेला में गायें अपने अस्थायी विश्रामस्थल पर ले जायी जाती हैं जहाँ पर श्रीजी की ओर से गायों को गेहूं दलिया व गुड की थूली खिलाई जाती है.\nइसके तुरन्त बाद सभी गायें नगर के प्राचीन मार्ग गुर्जरपुरा से खेलते हुए नाथूवास स्थित गौशाला में चली जाती हैं.\nनगरवासी व वैष्णव गोबर के गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं. अन्नकूट उत्सव गोवर्धन-पूजा के पश्चात श्री नवनीतप्रियाजी भीतर पधार श्रीजी के सम्मुख विराजित होकर अन्नकूट अरोगते हैं. \nअन्नकूट  \nडोलतिवारी के पिछले दो खण्डों में घास का ‘मिढ़ा’ (चाँवल रखने का घास निर्मित कुआ) बनाया जाता है जिस में अन्नकूट के डेढ़ सौ मण से अधिक भात (चांवल) का ढेर लगा अन्नकूट (अर्थात अन्न का शिखर) बनाया जाता है.\nउसके ऊपर चारों दिशाओं में घी में सेके हुए कसार के चार बड़े गुंजे और मध्य में एक गुंजा चक्र का आधा भीतर व आधा बाहर रखा जाता है.\nचारों दिशाओं के गुंजों पर क्रमशः शंख\, चक्र\, गदा व पद्म उकेरे  जाते हैं.\nशिखर पर तुलसी की मोटी माला धराई जाती है. इसके चारों ओर सखड़ी की सामग्रियां रखी जाती हैं.\nइन सामग्रियों से पौना रतनचौक और पूरी डोलतिवारी भर जाती है. \nइसके अतिरिक्त दूधघर तथा बालभोग की सामग्री निज मंदिर\, मणिकोठा एवं छठीकोठा में चार-चार टोकरे में एक के ऊपर एक करके रखी जाती है.\nप्रभु समक्ष भोग धरकर अन्नकूट के सेवक चिरंजीवी श्री विशाल बावा के संग अन्नकूट के मुखिया की अगुआई में श्रीजी मंदिर की बाहर की परिक्रमा करते हैं.  \nलगभग डेढ़ घंटे के पश्चात भोग सरने प्रारंभ हो जाते हैं. अनसखड़ी की सभी सामग्रियां हटा ली जाती है जबकि सखड़ी की केवल शाक\, दाल आदि की मटकियाँ रहने दी जाती हैं. लगभग 8.30 बजे दर्शन खुल जाते हैं. \nइन दर्शनों में थोड़ी-थोड़ी देर में विभिन्न भावों से नौ बार आरती होती है.\nचौथी आरती के बाद रात्रि लगभग 11.30 बजे भीलों को चाँवल लूटने दिया जाता है. भोग सरने के बाद भी दर्शनों में श्रीजी के सम्मुख निज मंदिर में आठ-आठ टोकरे रखे रहते हैं परन्तु इन्हें प्रभु श्री विट्ठलनाथजी के घर पधारने के पूर्व हटा लिया जाता है.\nपाँचवीं आरती के बाद द्वितीय पीठाधीश श्री कल्याणरायजी अपने सेवकों सहित पधार कर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी को अपने घर पधरा ले जाते हैं.\nनवीं और अंतिम आरती के पश्चात श्री नवनीतप्रियाजी बगीचे से होकर अपने घर पधार जाते हैं. \nश्री नवनीतप्रियाजी व श्री विट्ठलनाथजी अन्नकूट पश्चात घर पधारें तब यह कीर्तन गाया जाता है.\nपूज के घर आये गोवर्धन\, पूज के घर आये l\nजननी जसोदा करत आरती\, मोतिन चौक पुराये…ll 1 ll\nमंगल कलश विराजत द्वारे\, वन्दनमाल बंधाये…ll 2 ll लालदास गीरवर गीर पूज्यो\, भये भक्तन मन भाये…ll 3 ll \nउत्थापन के बाद का सेवाक्रम सभी तीन मंदिरों में इसके बाद होता है व लगभग 4 बजे शयन के अनोसर होते हैं.\nSource : Source : Shrinathji Temple Management\n       : facebook page : Shreenathji Nity darshan \nधन त्रयोदशी से देव प्रबोधिनी एकादशी के पद
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-30/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251020
DTEND;VALUE=DATE:20251021
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121539Z
LAST-MODIFIED:20250722T121539Z
UID:30727-1760918400-1761004799@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 14
DESCRIPTION:रूप चतुर्दशी (अभ्यंग)\, दीपावली (दीपोत्सव) हटड़ी (गोकर्ण जागरणम्) कान जगाई। दीपोत्सव  \nयह दिवारी वरस दिवारी\, तुमको नित्य नित्य आवो ।\nनंदराय और जसोदारानी\, अति सुख पूजही पावो ।।१।।\nपहले न्हाय तिलक गोरोचन\,देव पितर पूजवो ।\n श्रीविट्ठलगिरिधरन संग ले गोधन पूजन आवो ।।२।। \nश्रीजी को नियम के लाल सलीदार ज़री की सूथन\, फूलक शाही श्वेत ज़री की चोली\, चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर ज़री की कुल्हे के ऊपर पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ धरायी जाती है. \nआज विशेष रूप से श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में दीवला व दूधघर में सिद्ध की गयी केसरयुक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है. \nराजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता और सखड़ी में केसरयुक्त पेठा\, मीठी सेव आदि अरोगाये जाते हैं.  \nभोग समय फीका के स्थान पर बीज-चालनी के सूखे मेवे अरोगाये जाते हैं.\nआरती समय अरोगाये जाने वाले ठोड के स्थान पर गेहूँ के पाटिया के बड़े लड्डू अरोगाये जाते हैं.  \nराजभोग दर्शन –  \nकीर्तन – (राग : सारंग) \nगुड़ के गुंजा पुआ सुहारी\, गोधन पूजत व्रज की नारी ll 1 ll\nघर घर गोमय प्रतिमा धारी\, बाजत रुचिर पखावज थारी ll 2 ll\nगोद लीयें मंगल गुन गावत\, कमल नयन कों पाय लगावत ll 3 ll\nहरद दधि रोचनके टीके\, यह व्रज सुरपुर लागत फीके ll 4 ll\nराती पीरी गाय श्रृंगारी\, बोलत ग्वाल दे दे करतारी ll 5 ll\n‘हरिदास’ प्रभु कुंजबिहारी मानत सुख त्यौहार दीवारी ll 6 ll \nसाज – आज श्रीजी में नित्यलीलास्थ गौस्वामी तिलकायत श्री दाऊजी महाराज (द्वितीय) कृत जड़ाव की\, श्याम आधारवस्त्र पर कूंडों में वृक्षावली एवं पुष्प लताओं के मोती के सुन्दर ज़रदोज़ी के काम वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी\, तकिया जडाऊ एवं चरणचौकी पर लाल रंग की मखमल की बिछावट की जाती है.  \nवस्त्र – श्रीजी को आज लाल सलीदार ज़री का सूथन\, फूलक शाही श्वेत ज़री के रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित चोली एवं चाकदार वागा धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र अमरसी रंग के धराये जाते हैं. \nश्रृंगार – श्रीजी को आज वनमाला का (चरणारविन्द तक) तीन जोड़ी (माणक\, हीरा-माणक व पन्ना) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा – हीरे\, मोती\, माणक\, पन्ना तथा जड़ाव सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं.\nश्रीमस्तक पर फूलकशाही श्वेत ज़री की जडाव की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच\, तथा पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में हीरा के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर माणक की चोटी (शिखा) धरायी जाती है.\nपीठिका के ऊपर प्राचीन हीरे का जड़ाव का चौखटा धराया जाता है.\nश्रीकंठ में बघनखा धराया जाता है. गुलाबी एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर थागवाली मालाजी धरायी जाती है.\nश्रीहस्त में कमलछड़ी\, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.\nआरसी जड़ाऊ की आती हैं. \nकान जगाई \nश्री नवनीतप्रियाजी में सायं कानजगाई के व शयन समय रतनचौक में हटड़ी के दर्शन होते हैं.  \nकानजगाई – संध्या समय गौशाला से इतनी गायें लायी जाती है कि गोवर्धन पूजा का चौक भर जाए. गायें मोरपंख\, गले में घंटियों और पैरों में घुंघरूओं से सुशोभित व श्रृंगारित होती हैं. उनके पीठ पर मेहंदी कुंकुम के छापे व सुन्दर आकृतियाँ बनी होती है.  \nग्वाल-बाल भी सुन्दर वस्त्रों में गायों को रिझाते\, खेलाते हैं. गायें उनके पीछे दौड़ती हैं जिससे प्रभुभक्त\, नगरवासी और वैष्णव आनन्द लेते हैं. \nगौधूली वेला में शयन समय कानजगाई होती है. श्री नवनीतप्रियाजी के मंदिर से लेकर सूरजपोल की सभी सीढियों तक विभिन्न रंगों की चलनियों से रंगोली छांटी जाती है.  \nश्री नवनीतप्रियाजी शयन भोग आरोग कर चांदी की खुली सुखपाल में विराजित हो कीर्तन की मधुर स्वरलहरियों के मध्य गोवर्धन पूजा के चौक में सूरजपोल की सीढ़ियों पर एक चौकी पर बिराजते हैं.  \nप्रभु को विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध केशर मिश्रित दूध की चपटिया (मटकी) का अरोगायी जाती है.  \nकानजगाई के दौरान प्रभु को शिरारहित पान की बीड़ी अरोगाते हैं.\nश्रीजी व श्री नवनीतप्रियाजी के कीर्तनिया कीर्तन करते हैं व झालर\, घंटा बजाये जाते हैं.\nपूज्य श्री तिलकायत महाराज गायों का पूजन कर\, तिलक-अक्षत कर लड्डू का प्रशाद खिलाते हैं. गौशाला के बड़े ग्वाल को भी प्रशाद दिया जाता है.  \nतत्पश्चात पूज्य श्री तिलकायत नंदवंश की मुख्य गाय को आमंत्रण देते हुए कान में कहते हैं – “कल प्रातः गोवर्धन पूजन के समय गोवर्धन को गूंदने को जल्दी पधारना.” गायों के कान में आमंत्रण देने की इस रीती को कानजगाई कहा जाता है.\nप्रभु स्वयं गायों को आमंत्रण देते हैं ऐसा भाव है. इसके अलावा कानजगाई का\nएक और विशिष्ट भाव है कि गाय के कान में इंद्र का वास होता है और प्रभु कानजगाई के द्वारा उनको कहते हैं कि – “हम श्री गिरिराजजी को कल अन्नकूट अरोगायेंगे\, तुम जो चाहे कर लेना.” सभी पुष्टिमार्गीय मंदिरों में अन्नकूट के एक दिन पूर्व गायों की कानजगाई की जाती है. \nसारस्वतकल्प में श्री ठाकुरजी ने जब श्री गिरिराजजी को अन्नकूट अरोगाया तब भी इसी प्रकार कानजगाई की थी.\nश्री ठाकुरजी\, नंदरायजी एवं सभी ग्वाल-बाल अपनी गायों को श्रृंगारित कर श्री गिरिराजजी के सम्मुख ले आये. श्रीनंदनंदन की आज्ञानुसार श्री गिरिराजजी को दूध की चपटिया (मटकी) का भोग रखा गया और बीड़ा अरोगाये गये.  \nश्री गर्गाचार्यजी ने नंदबाबा से गायों का पूजन कराया था. तब श्री ठाकुरजी और नंदबाबा ने एक-एक गाय के कान में अगले दिन गोवर्धन पूजन हेतु पधारने को आमंत्रण दिया.  \nश्रीजी के शयन के दर्शन बाहर नहीं खुलते. \nशयन समय श्री नवनीतप्रियाजी रतनचौक में हटड़ी में विराजित हो दर्शन देते हैं.\nहटड़ी में विराजने का भाव कुछ इस प्रकार है कि नंदनंदन प्रभु बालक रूप में अपने पिता श्री नंदरायजी के संग हटड़ी (हाट अथवा वस्तु विक्रय की दुकान) में बिराजते हैं और तेजाना\, विविध सूखे मेवा व मिठाई के खिलौना आदि विक्रय कर उससे एकत्र धनराशी से अगले दिन श्री गिरिराजजी को अन्नकूट का भोग अरोगाते हैं. \nरात्रि लगभग 8.30 बजे तक दर्शन खुले रहते हैं और दर्शन उपरांत श्री नवनीतप्रियाजी श्रीजी में पधारकर संग विराजते हैं. \nश्री गुसांईजी\, उनके सभी सात लालजी\, व तत्कालीन परचारक महाराज काका वल्लभजी के भाव से 9 आरती होती है.\nश्री गुसांईजी व श्री गिरधरजी की आरती स्वयं श्री तिलकायत महाराज करते हैं.\nअन्य गृहों के बालक यदि उपस्थित हों तो वे श्री तिलकायत से आज्ञा लेकर सम्बंधित गृह की आरती करते हैं और अन्य की उपस्थिति न होने पर स्वयं तिलकायत महाराज आरती करते हैं.  \nकाका वल्लभजी की आरती श्रीजी के वर्तमान परचारक महाराज गौस्वामी चिरंजीवी श्री विशालबावा करते हैं.    \nआज श्रीजी में शयन पश्चात पोढावे के व मान के पद नहीं गाये जाते.\nदिवाली की रात्रि शयन उपरांत श्रीजी व श्री नवनीतप्रियाजी प्रभु लीलात्मक भाव से गोपसखाओं\, श्री स्वामिनीजी\, सखीजनों सहित अरस-परस बैठ चौपड़ खेलते हैं.\nअखण्ड दीप जलते हैं\, चौपड़ खेलने की अति आकर्षक\, सुन्दर भावात्मक साज-सज्जा की जाती है.  \nदीप इस प्रकार जलाये जाते हैं कि प्रभु के श्रीमुख पर उनकी चकाचौंध नहीं पड़े. इस भावात्मक साज-सज्जा को मंगला के पूर्व बड़ाकर (हटा) लिया जाता है.  \nइसी भाव से दिवाली की रात्रि प्रभु के श्रृंगार बड़े नहीं किये जाते और रात्रि अनोसर भी हल्के श्रृंगार सहित ही होते हैं.  \nकान जगाई \n“गोवर्धन पूजन के समय गोवर्धन को गूंदने को जल्दी आना” का निमंत्रण लेकर प्रस्थान करती हुई गायें  | Source : Source : Shrinathji Temple Management\n       : facebook page : Shreenathji Nity darshan \nधन त्रयोदशी से देव प्रबोधिनी एकादशी के पद
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-14/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251019
DTEND;VALUE=DATE:20251020
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121538Z
LAST-MODIFIED:20250722T121538Z
UID:30725-1760832000-1760918399@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 13
DESCRIPTION:धन तेरस  \nसेवा क्रम :  \nमणि कोठा में रंगोली व दीपक को पाट आवे।निज मंदिर में रोशनी को झाड़ आवे।डेली मंडे\, बंदरवाल बंधे।चारो समय आरती थाली की । \nसाज :- श्रीजी में आज लाल रंग की मखमल के ऊपर सुनहरी सुरमा सितारा के कशीदे के ज़रदोज़ी के काम वाली पिछवाई धरायी जाती है | गादी\, तकिया एवं चरणचौकी पर लाल रंग की मखमल की बिछावट की जाती है | \nवस्त्र:- सब हरी सलीदार जरी के-चागदार बागा\,चोली\,सुथन\, पटका\, चीरा आवे।ठाड़े वस्त्र लाल। पिछवाई सिलमा सितारा की। \nआभरण:- श्रीमस्तक पर हरे रंग की सलीदार ज़री के चीरा (ज़री की पाग) के ऊपर अनारदाना को पट्टीदार सिरपैंच (दोनों ओर मोती की माला से सुसज्जित)\, पन्ना की लूम\, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं | \nश्रृंगार बनमाला के।माणक की प्रधानता । त्रवल नही टोडर आवे।कर्ण फूल चार माणक के।श्रीमस्तक पे मोर चन्द्रिका सादा।वेण वेत्र माणक के\,एक वेत्र पन्ना को।पट हरो \,गोटी सोना की शतरंज ।आरसी लाल मखमल की।हीरा को चौखटा आवे। \nआरती के बाद श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े करके\,छेड़ान के श्रृंगार करने।लूम तुर्रा सुनहरी। \nफीका में चालनी(तले हुए सूखे मेवे)रसोई में केसर युक्त पेठा\,मीठी सेव आदी अरोगे।अधकि में रवा की खीर अरोगे। गोपी वल्लभ में केसरी चंद्रकला। \nमंगला – गोकुल गोधन पूजही \nराजभोग – गोवर्धन पूजा कर गोविन्द \nआरती – खेलन को सब गांग बुलाई \nशयन – दीपदान दे हटरी बैठे \nपोढवे – रचित रुचिर तर सेज बनाई \nSeva kram  courtesy: Shrinathji Temple Nathdwara Management |  \nकई बार दिवाली चतुर्दशी को आने से धन तेरस के शृंगार क्रम वत्स द्वादशी को\, रूप चतुर्दशी के शृंगार क्रम त्रयोदशी को लिए जाते है | परंतु रूप चतुर्दशी का अभ्यंग क्रम चतुर्दशी – दीपावली के दिन ही लिया जाता है |  \nधन त्रयोदशी से देव प्रबोधिनी एकादशी के पद
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-13/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251018
DTEND;VALUE=DATE:20251019
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121537Z
LAST-MODIFIED:20250722T121537Z
UID:30723-1760745600-1760831999@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 12
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-12/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251017
DTEND;VALUE=DATE:20251018
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121536Z
LAST-MODIFIED:20250722T121536Z
UID:30721-1760659200-1760745599@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 11
DESCRIPTION:रमा एकादशी व्रतम्।
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-11/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251016
DTEND;VALUE=DATE:20251017
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121534Z
LAST-MODIFIED:20250722T121534Z
UID:30719-1760572800-1760659199@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 10
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-10/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251015
DTEND;VALUE=DATE:20251016
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121531Z
LAST-MODIFIED:20250722T121531Z
UID:30717-1760486400-1760572799@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 9
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-9/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251014
DTEND;VALUE=DATE:20251015
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121528Z
LAST-MODIFIED:20250722T121528Z
UID:30715-1760400000-1760486399@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 8
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-8/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251013
DTEND;VALUE=DATE:20251014
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121523Z
LAST-MODIFIED:20250722T121523Z
UID:30713-1760313600-1760399999@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 7
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-7/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251012
DTEND;VALUE=DATE:20251013
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121517Z
LAST-MODIFIED:20250722T121517Z
UID:30711-1760227200-1760313599@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 6
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-6/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251011
DTEND;VALUE=DATE:20251012
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121513Z
LAST-MODIFIED:20250722T121513Z
UID:30709-1760140800-1760227199@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 5
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-5/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251010
DTEND;VALUE=DATE:20251011
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121510Z
LAST-MODIFIED:20250722T121510Z
UID:30707-1760054400-1760140799@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 4
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-4/
END:VEVENT
BEGIN:VEVENT
DTSTART;VALUE=DATE:20251009
DTEND;VALUE=DATE:20251010
DTSTAMP:20260501T094538
CREATED:20250722T121507Z
LAST-MODIFIED:20250722T121507Z
UID:30705-1759968000-1760054399@vrajdwar.org
SUMMARY:अश्विन कृष्णपक्ष 3
DESCRIPTION:
URL:https://vrajdwar.org/tithi/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7-3/
END:VEVENT
END:VCALENDAR