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DESCRIPTION:वर्षे हर्षः प्रकर्षः स्यात् । इष्टिः। १६ मार्च २०२६\, संवत्सोत्सव प्रातः ६ बजके ५४ मिनिट पश्चात्\, प्रतिपदा को क्षय होयवे सूं आज। \nसन् 2026  – 2083 संवत्सरोत्सवः |  नववर्ष आरंभ \nनव वर्ष सेवा क्रम : \nसभी द्वार में डेली मंढे बंदरवाल बंधे। थाली की आरती। जमना जल की झरीजी भरावे।गेंद चौगान\,दिवाला सोना के।अभ्यंग ।भाँतवार बंटा चढ़े। पण्ड्याजी टीपना बांचे।राजभोग में गुलाब की दोहरा मंडली आवे।आज से जरी के वस्त्र नहीं आवे।मंगला में आज से उपरना धरावे।राजभोग में छः बीड़ा की सिकोरी आवे। \nवस्त्र:-खुले बन्ध\, कूल्हे लाल छापा के\,सुनहरी किनारी के।सुथन पीले छापा की।ठाड़े वस्त्र मेघ स्याम दरियाई के।पिछवाई लाल छापा की हरे हाशिया की। \nआभरण:-सब उत्सव के।हीरा की प्रधानता।बनमाला को श्रृंगार।\nश्रीकर्ण में हीरा के कुंडल\nकली\, कस्तूरी आदी सब धरावे।कूल्हे पे टिका\,त्रवल दोहरा।श्रीमस्तक पे पाँच मोर चन्द्रिका को जोड़।चोटीजी हीरा की।वेणु वेत्र तीनो हीरा के।पट उत्सव को\,गोटी सोना की ।आरसी राजभोग में सोना के डाँड़ी की\,श्रृंगार में चार झाड़ की।\n Source : Nathdwara Management
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SUMMARY:फाल्गुन कृष्णपक्ष 1
DESCRIPTION:द्वितीया पाट ।  व्रज – चैत्र कृष्ण द्वितीया \nद्वितीया पाट \nविशेष – व्रज से पधारने के पश्चात फाल्गुन कृष्ण सप्तमी (पाटोत्सव) को प्रभु वर्तमान मंदिर के सिद्ध होने तक मंदिर के बाहर खर्च-भण्डार में विराजे थे. तत्पश्चात आज के दिन वर्तमान पाट पर विराजित हुए थे अतः आज के दिन को द्वितीया पाट कहा जाता है. \nइस उत्सव का एक और भाव है कि वसंत-पंचमी से डोलोत्सव तक व्रजभक्त प्रभु के साथ परस्पर सख्यभाव से होली खेलते हैं. व्रजराजकुमार प्रभु को प्रभु ना मानते हुए अपने समान मान उनके साथ झकझोरी करते हैं\, फगवा मांगते हैं\, ओढ़नियाँ ओढाकर और विविध स्त्री वेश पहनाकर अपने साथ नचाते हैं.\nउन दिनों में ईश्वर भाव नही रहता अतः नंदरायजी आज के दिन प्रभु को पुनः पाट पर बिठाकर पूर्ववत नंदकुमार-व्रजराजकुमार के रूप में स्थापित करते हैं\, इस भाव से आज का यह उत्सव मनाया जाता है. \nइस सन्दर्भ में परमानंददास जी ने गाया है –\nलाल नेक देखिये भवन हमारो |\nद्वितीया पाट सिंहासन बैठे\, अविचल राज तुम्हारो || 1 || \nआज का उत्सव चन्द्रावलीजी की ओर का उत्सव है अतः उनकी ओर से राजभोग में चैत्री-गुलाब की फूल मंडली का मनोरथ होता है. आज से\n10 दिन कुंजलीला यमुनाजी के भाव के\,\n10 निकुंजलीला ललिताजी के भाव के\,\n10 दिन निबिड़ निकुंजलीला चन्द्रावलीजी के भाव के एवं अंतिम\n10 दिन निभृत निकुंजलीला के स्वामिनीजी के भाव के होते हैं. \nइन चालीस दिनों की निकुंजलीला के पश्चात श्री वल्लभाधीश जी का प्राकट्य होता है. निकुंजलीला के सुन्दर पद इस दिनों में गाये जाते हैं.\n“नेक कुंज कृपा पर आईये…”(सूरदासजी)\n“चलोकिन देखन कुंजकुटि…”(परमानंददासजी) \nसेवाक्रम – शीतकाल की सेवा पूर्ण हो चुकी है अतः आज से सेवाक्रम में काफी अंतर आ जायेगा. प्रभु के सम्मुख धरी जाने वाली अंगीठी आज से नहीं रखी जाएगी.\nगन्ने का रस\, रतालू की चटनी\, घी भरी पिण्ड-खजूर\, फलों में गन्ना\, सूरण\, अरबी और रतालू की सब्जी (सखड़ी व अनसखड़ी)\, सभी प्रकार (गेहूं\, मूँग-दाल\, चना-दाल\, बादाम\, शकरकंद आदि) के सीरा आदि शीतकाल की सामग्रियां आज से नहीं अरोगायी जायेंगी.\nसिंहासन एवं पंखा धरे जाते हैं. आज से अक्षय-तृतीया तक चांदी का कुंजा धराया जाता है (तत्पश्चात माटी का कुंजा प्रारंभ हो जायेगा). होली खेल के चालीस दिनों तक ज़री के वस्त्र\, साज\, हीरा\, पन्ना\, माणक\, मोती एवं जड़ाव स्वर्ण के आभरण आदि नहीं धराये जाते जो कि आज से पुनः प्रारंभ हो जायेंगे. आज से रंगीन साज (गादी-तकिया) प्रारंभ हो जायेंगे जो कि रामनवमी तक चलेंगे. आज से गोपाष्टमी तक राजभोग धरे तब छाक के पद गाये जाते हैं. \nमंगला दर्शन पश्चात प्रभु को चन्दन\, आवंला\, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है. आज विशेष रूप से प्रभु को दोहरा अभ्यंग कराया जाता है. \nदत्तु लाल किनखाब की बड़े बूटा (रुई विहीन गद्दल) का \nकीर्तन –मंगला दर्शन (राग : बिलावल) \nप्यारी के महल ते ऊठ चले भोर \nलाल नेक भवन हमारे आवो ।\nजो मांगो सो देहो मोहन ले मुरली कल गावो ।।१।।\nमंगलचार करो गृह मेरे संगके सखा बुलावो ।\nकरो विनोद सुंदर युवतीनसों प्रेम पीयूष पीवावो ।।२।।\nबलबल जाऊं मुखारविंदकी ललित त्रिभंग दीखावो ।\nपरमानंद सहचरी रसभर ले चली करत उपावो ।।३।। \nआज प्रभु को नियम के सुनहरी ज़री के चाकदार वस्त्र और श्रीमस्तक पर हीरा की कुल्हे पर सुनहरी घेरा धराये जाते हैं. \nउत्सव के कारण गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में चाशनी लगे पक्के गुंजा अरोगाये जाते हैं. इसके अतिरिक्त प्रभु को दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी का भोग भी अरोगाया जाता है. \nराजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है. \nश्रृंगार दर्शन \nसाज – आज श्रीजी में फूलक शाही ज़री की हरे हांशिया वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी\, तकिया एवं चरणचौकी के ऊपर से सफेदी बड़ी कर (हटा) दी जाती है. उत्सव के दिवसों में मलमल के गादी-तकियों में सफ़ेद बिछावट नहीं की जाती इसलिए ऐसा कहा जाता है. \nवस्त्र – आज श्रीजी को सुनहरी ज़री के बिना किनारी के सूथन\, चोली एवं चाकदार वागा धराये जाते हैं. पटका रूपहरी ज़री का धराया जाता हैं. ठाडे वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं. \nश्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा – हीरा की प्रधानता के मोती\, माणक\, पन्ना एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं.\nश्रीमस्तक पर जड़ाव स्वर्ण की कुल्हे के ऊपर सुनहरी जड़ाव का घेरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में हीरा के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. बायीं ओर हीरा की चोटीजी धरायी जाती है.\nनीचे सात पदक ऊपर हीरा\, पन्ना\, माणक\, मोती के हार व माला धराये जाते हैं. कली\, कस्तूरी आदि माला धरायी जाती हैं.\nचैत्री गुलाब के पुष्प की सुन्दर थागवाली वनमाला धरायी जाती है.\nश्रीहस्त में पुष्पछड़ी\, हीरा के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.\nपट उत्सव का एवं गोटी जड़ाऊ की आती है.\nआरसी चार झाड़ की दिखाई जाती है. \nराजभोग दर्शन \nकीर्तन – (राग : सारंग) \nलाल नेक देखिये भवन हमारो |\nद्वितीया पाट सिंहासन बैठे\, अविचल राज तुम्हारो || 1 ||\nसास हमारी खरिक सिधारी पिय वन गयो सवारो |\nआसपास घर कोऊं नाहीं यह एकांत है न्यारो || 2 ||\nओट्यो दूध सदा धोरीको लेहु श्याम घन पीजे |\n‘परमानंद दास’ को ठाकुर कछु कह्यो हमारो कीजे || 3 || \nआज से श्रीजी में फूल-मंडली के मनोरथ प्रारंभ हो जाते हैं. जिस दिन फूल-मंडली का मनोरथ हो उस दिन फूल-मंडली के कीर्तन गाये जाते हैं. \nआज श्रीजी में नियम की चैत्री गुलाब की मंडली आती है. विश्व प्रसिद्द चैत्री गुलाब नाथद्वारा के निकट खमनोर गाँव में बहुतायत में पाये जाते हैं और इस पुष्प की यह विशेषता है कि ये केवल चैत्र मास में ही पल्लवित होते हैं. सामान्य गुलाब की तुलना में इसकी पत्तियां अधिक कोमल एवं इसकी सुगंध कई गुना अधिक होती है. \nश्रृंगार समय धरायी पिछवाई ग्वाल बाद बड़ी कर (हटा) दी जाती है और चैत्री गुलाब से निर्मित मंडली (बंगला) में श्रीजी विराजित होते हैं. राजभोग से संध्या-आरती तक प्रभु मंडली में विराजते हैं. \nमनोरथ के रूप में विविध सामग्रियां प्रभु को अरोगायी जाती हैं. \nकीर्तन (राग : सारंग) \nबैठे लाल फूलनकी चौखंडी |\nचंपक बकुल गुलाब निवारो रायवेलि श्रीखंडी || 1 ||\nजाई जुई केवरो कूजो करण कनेर सुरंगी |\n‘चतुर्भुजप्रभु’ गिरिधरनजूकी बानिक दिन दिन नवनवरंगी || 2 || \nसंध्या-आरती दर्शन उपरांत प्रभु के श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर हल्के छेड़ान के आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर हीरा की कूल्हे बड़ी करके लाल कूल्हे धरायी जाती हैं. \nसभी वैष्णवों को श्रीजी के द्वितीया पाट की खूब खूब बधाई \nSeva kram Source : Shrinathji Temple Management\n                 : facebook page : Shreenathji Nity darshan
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DESCRIPTION:धूलिवन्दन (धुरेण्डी)\, दोलोत्सव (डोल)\, ग्रस्तोदित खग्रास चन्द्रग्रहण
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DESCRIPTION:होली\, होलिका प्रदीपनं १५ मंगल के भद्रा निवृत्ति ५ बजकर २६ मिनिट पश्चात् तथा सूर्योदयात् ६ बजके ५७ मिनिट सूं पूर्व। \nहोली का उत्सव \nसामान्यतया होलिकोत्सव तिथी प्रधान होने से फ़ाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन और डोलोत्सव नक्षत्र प्रधान होने के कारण जिस दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र होवे उस दिन मनाया जाता है. \nआज के पर्व को बड़ा मानते हुए श्री स्वामिनीजी आज स्वयं प्रभु को अभ्यंग कराती हैं इस भाव से आज प्रभु को मंगला पश्चात प्रभु को चन्दन\, आवंला\, उबटना एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से दोहरा अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है एवं श्वेत नूतन वस्त्र धराये जाते हैं. \nगद्दल हरे साटन का \nकीर्तन –मंगला दर्शन (राग : देवगंधार) \nहो हो होरी खेलन जैये \nहोली का उत्सव \nआज प्रभु को नियम से पाग-चन्द्रिका\, सूथन व घेरदार वागा धराये जाते हैं \nसाज – आज श्रीजी में राजभोग में सफ़ेद मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल व अबीर से भारी खेल किया जाता है. गादी\, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है. गुलाल खेल इतना अधिक होता है कि पिछवाई और साज का मूल रंग दिखायी ही नहीं पड़ता. \nवस्त्र – आज श्रीजी को सफ़ेद लट्ठा का सूथन\, चोली तथा घेरदार वागा धराये जाते हैं. पटका मोठड़ा का धराया जाता है जिसके दोनों छोर आगे की ओर रहते हैं.\nसभी वस्त्रों पर गुलाल अबीर\, एवं चोवा आदि से भारी खेल किया जाता है. ठाडे वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं जिनपर गुलाल\, अबीर आदि से खेल किया जाता है. \nश्रृंगार – आज प्रभु को मध्य का (छेड़ान से दो आंगुल नीचे तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. लाल\, हरे\, सफ़ेद व मेघश्याम मीना एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर सफ़ेद छज्जेदार श्याम झाईं वाली पाग के ऊपर हरा पट्टीदार सिरपैंच\, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं.\nश्रीकंठ में सात पदक\, नौ माला धरायी जाती है. दो माला अक्काजी की धरायी जाती है. गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं. श्रीहस्त में पुष्पछड़ी\, स्वर्ण के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (स्वर्ण के बटदार व एक नाहरमुखी) धराये जाते हैं. पीठिका के ऊपर भी गुलाब के पुष्पों की एक मोटी मालाजी धरायी जाती है.\nपट चीड़ का व गोटी चांदी की आती है. आरसी दोनों समय बड़ी डांडी की आती है.\nभारी खेल के कारण सर्व श्रृंगार रंगों से सरोबार हो जाते हैं और प्रभु की छटा अद्भुत प्रतीत होती है. \nफाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से श्रीजी में डोलोत्सव की सामग्रियां सिद्ध होना प्रारंभ हो जाती है. इनमें से कुछ सामग्रियां फाल्गुन शुक्ल नवमी से प्रतिदिन गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में श्रीजी को अरोगायी जाती हैं और डोलोत्सव के दिन भी प्रभु को अरोगायी जायेंगी.\nइस श्रृंखला में आज श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में मीठे कटपूवा अरोगाये जाते हैं.\nइसके अतिरिक्त आज उत्सव के कारण प्रभु को दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी का भोग भी अरोगाया जाता है. \nराजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता और सखड़ी में मीठी सेव व केशरयुक्त पेठा अरोगाये जाते हैं. \nराजभोग खेल में पिछवाई को गुलाल से पूरा रंगा जाता है और उस पर अबीर से चिड़िया मांडी जाती है. चंदवा पर चंदन छांटा जाता है. \nश्रीजी की दाढ़ी पर तीन बिंदी लगायी जाती है. प्रभु के सम्मुख चार पान के बीड़ा सिकोरी (स्वर्ण के जालीदार पात्र) में रखे जाते हैं. \nआज गुलाल\, अबीर का खेल अन्य दिनों की तुलना में अत्यन्त भारी होता है. वैष्णवजनों पर भी गुलाल पोटली भर कर उड़ाई जाती है. \nराजभोग दर्शन – \nकीर्तन – (राग : सारंग) \nडोल झूलत है प्यारो लाल बिहारी पहोपवृष्टि होती l\nसुरपुर गंधर्व तिनकी नारी देखके वारत है लर मोती ll 1 ll\nघेरा करत परस्पर सबमिल नहीं देखीयत युवती ऐसी जोती l\n‘हरिदास’ के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी सादाचूरी खुभी पोती ll 2 ll \nसंध्या-आरती दर्शन उपरांत श्रीकंठ व श्रीमस्तक के आभरण बड़े किये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा सुनहरी धराये जाते हैं. गठेली की हमेल धरायी जाती है. \nश्रीजी की एक अद्भुत परंपरा \n….श्रीजी में होली के त्यौहार के दिन शयन के दर्शन में परम्परागत रूप से परमपूज्य श्रीतिलकायत प्रभु श्री गोवर्धनधरण की दाढ़ी रंगेंगे अर्थात प्रेम से प्रभु की दाढ़ी पर गुलाल लगाकर डोलोत्सव की परंपरागत शुरुआत करेंगे. \nआज के दिन शयन में भी गुलाल खेल होता है और खूब गुलाल उड़ायी जाती है. आज शयन दर्शन में प्रभु को एक वेत्र श्रीहस्त में धरायी जाती है जिससे प्रभु व्रजभक्तों को घेर सके. \nSeva Kram Source : Shrinathji Temple Management\n                 : facebook page : Shreenathji Nity darshan \nVasant Nitya Seva Kirtan
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SUMMARY:फाल्गुन शुक्लपक्ष 11
DESCRIPTION:आमलकी (कुंज) एकादशी व्रतम्।  कुंज एकादशी  \nगद्दल हरे साटन का  \nविशेष – आज कुंज एकादशी है. इसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है.  \nश्रीजी का सेवाक्रम – उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को पूजन कर हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.  \nआज पूरे दिन झारीजी में यमुनाजल भरा जाता है. आरती सभी समय (मंगला\, राजभोग\, संध्या-आरती व शयन) थाली में की जाती है.  \nमंगला दर्शन पश्चात प्रभु को चन्दन\, आवंला\, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है. \nसाज – श्रृंगार दर्शन में कुंज के भाव की पिछवाई आती है जिसे ग्वाल समय बड़ा कर दिया जाता है.\nप्रातः धरायी पिछवाई राजभोग में बड़ी कर (हटा) दी जाती है और सफ़ेद मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर उत्सव होने के कारण गुलाल\, चन्दन से भारी खेल किया जाता है. गादी\, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है. \nवस्त्र व श्रृंगार –  \nआज नियम का मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जाता है.\nवस्त्र व श्रृंगार ऊपर वर्णित ही रहते हैं. चन्दन के पत्तों एवं गुलाब के पुष्पों की सज्जा वाला चौखटा पीठिका पर धराया जाता है. एवं श्रीमस्तक पर मीना का मुकुट को बड़ा करके पुष्पों का अद्भुत मुकुट धराया जाता हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर\, गुलाल आदि को छांटकर कलात्मक रूप से खेल किया जाता है. प्रभु के कपोल पर भी गुलाल\, अबीर लगाये जाते हैं. अत्यधिक गुलाल खेल के कारण वस्त्र लाल प्रतीत होते हैं एवम् सर्व श्रृंगार रंगों से सरोबार हो जाते हैं और प्रभु की छटा अद्भुत प्रतीत होती है. \nवर्ष में केवल आज श्रीजी को एक दिन में तीन विविध प्रकार के मुकुट धराये जाते हैं.\nप्रातः श्रृंगार में स्वर्ण का मीनाकारी वाला मुकुट\, राजभोग में पुष्प का मुकुट एवं संध्या-आरती में विविध पुष्पों का ही अन्य मुकुट प्रभु को धराया जाता है. \nफाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से श्रीजी में डोलोत्सव की सामग्रियां सिद्ध होना प्रारंभ हो जाती है. \nफाल्गुन शुक्ल दशमी से इनमें से कुछ सामग्रियां प्रतिदिन गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में श्रीजी को अरोगायी जाती हैं और डोलोत्सव के दिन भी प्रभु को अरोगायी जायेंगी.\nइस श्रृंखला में आज श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में मेवाबाटी अरोगायी जाती हैं.  \nइसके अतिरिक्त आज उत्सव के कारण प्रभु को दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी भी अरोगायी जाती है. \nराजभोग दर्शन  \nराजभोग समय श्रीजी के निज मंदिर में केले के वृक्षों\, चन्दन व आशापाल के पत्तों\, आम्र मंजरियों एवं गुलाब के पुष्पों से कुंज के भाव की साज-सज्जा की जाती है. \nराजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है. \nप्रातः धराया प्रभु का मुकुट बदल कर पुष्प का अत्यन्त सुन्दर मुकुट धराया जाता है. इसके अतिरिक्त आज विशेष रूप से राजभोग समय जब गुलाल खेल के समय वेणुजी श्रीहस्त से फेंट (कमर) में धरायी जाती है जिससे श्रीजी अपने भक्तों पर दोनों हाथों से गुलाल उड़ाकर उन्हें रस-विभोर कर सके और व्रजभक्त गोपियाँ झपट कर उनकी वेणुजी ना चुरा सकें.  \nयद्यपि वेत्रजी ठाडे (खड़े) ही धरे जाते हैं जिससे प्रभु व्रजभक्तों को घेर सके. \nश्री नवनीतप्रियाजी में राजभोग तक का सेवाक्रम अन्य दिनों की तुलना में कुछ जल्दी हो जाता है. अपने घर में राजभोग अरोगने के उपरांत श्री नवनीतप्रियाजी को बगीचे के रास्ते श्रीजी में पधराते हैं जहाँ प्रभु श्री लाड़ले-लाल श्रीजी के साथ कुंज में विराजित हो राजभोग के दर्शन देते हैं और गुलाल व अबीर से खेलते हैं.\nपिछवाई को गुलाल से पूरा रंगा जाता है और उस पर अबीर से चिड़िया मांडी जाती है. \nश्रीजी की दाढ़ी पर पांच बिंदी लगायी जाती है. प्रभु के सम्मुख चार पान के बीड़ा सिकोरी (स्वर्ण के जालीदार पात्र) में रखे जाते हैं. \nआज गुलाल\, अबीर का खेल अन्य दिनों की तुलना में अत्यन्त भारी होता है. वैष्णवजनों पर भी गुलाल पोटली भर कर उड़ाई जाती है. \nराजभोग दर्शन के पश्चात श्री नवनीतप्रियाजी अपने घर पधार कर पुनः गुलाल खेलते हैं.  \nयहाँ श्री गोवर्धनधरण प्रभु दिन के अनोसर भोग में उत्सव भोग अरोगते हैं जो कि उत्थापन के शंखनाद पश्चात सराये जाते हैं.\nउत्सव भोग में विशेष रूप से केशर-युक्त चन्द्रकला\, मूँग की दाल के गुंजा\, उड़द की दाल की कचौरी\, दहीवड़ा\, केशर-युक्त चांवल की खीर\, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी\, दूधपूड़ी (मलाईपूड़ी)\, केसरी बासोंदी\, जीरा मिश्रित दही\, केसरी-सफेद मावे की गुंजिया\, तले हुए बीज-चालनी के सूखे मेवा\, विविध प्रकार के संदाना (आचार) के बटेरा\, विविध प्रकार के फलफूल\, शीतल आदि अरोगाये जाते हैं. \nआज से चार दिन की सेवा चारों युथाधिपतियों की ओर से सेवा होती है. चारों स्वामिनीजी चारों दिशाओं में प्रभु को डोल झूलाती हैं अतः आज से राजभोग सम्मुख एवं शयन सम्मुख डोल के पद गाये जाते हैं. नंदालय\, यमुनापुलिन\, श्री गिरिराजजी एवं निकुंज…इन चार स्थानों पर प्रभु डोल झूलते हैं.  \nइस प्रकार आज से श्रीजी में निकुंज लीला का प्रारंभ हो जाता है. इसी कारण इस एकादशी को कुंज एकादशी कहा जाता है. व्रज के बारह वन एवं बारह उपवनों के भाव से वर्ष में केवल आज श्रीजी के निजमंदिर में कुंज बनाया जाता है. \nआज से डोल तक श्रीजी में श्री गुसांईजी कृत अष्टपदी के कीर्तन के स्थान पर डोल के पद ही गाये जाते हैं. \nसंध्या-आरती में प्रभु का मुकुट पुनः बदल कर पुष्प का अत्यन्त सुन्दर मुकुट धराया जाता है. \nश्री नवनीतप्रियाजी भी स्वर्ण के मुकुट को धराये श्रीजी की गोदी में विराजित होते हैं. \nसंध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के आभरण\, दोनों काछनी\, मुकुट\, टोपी व पटका बड़े किये जाते हैं व चोवा के घेरदार वागा धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर गोल-पाग व लाल तनी के ऊपर सुनहरी लूम-तुर्रा धराये जाते हैं.\nश्रीकंठ में छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं.\nयदि सर्दी नहीं होवे तो प्रभु को शयन में पुष्प के आभरण धराये जा सकते हैं. \nआज शयन सम्मुख भी मान के अथवा पोढवे के पद नहीं गाये जाते. शयन सम्मुख भी डोल के एवं गारी के पद ही गाये जाते हैं.\nऐसी भावना है कि प्रभु सारी रात कुंज में रसरूप होली खेलते हैं.\nकई वैष्णव मंदिरों एवं हवेलियों में आज से फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा तक प्रतिदिन शयन में भी श्री ठाकुरजी को गुलाल खेलायी जाती है और वैष्णवों पर भी गुलाल उड़ायी जाती है.  \nहिंडोरा की भांति कुंज एकादशी और डोल भी अत्यंत रहस्यलीला है. \nSource : Shrinathji Temple Management\n       : facebook page : Shreenathji Nity darshan \nVasant Nitya Seva Kirtan
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DESCRIPTION:श्री मथुरेशजी को पाटोत्सव  | सप्तमी को क्षय होयवे सु आज | श्री मथुराधीशजी की लीला भावना\, स्वरूप भावना\, इतिहास जानने के लिए हमारे गध्य साहित्य के निधि स्वरूप नामक ई-बुक को पढे |  Nidhi Swaroops
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